Published : Aug 15, 2020, 01:21 PM ISTUpdated : Aug 20, 2020, 11:54 AM IST
मुंबई. डायरेक्टर रमेश सिप्पी की फिल्म 'शोले' की रिलीज को 45 साल हो गए हैं। फिल्म की असली रिलीज डेट 14 अगस्त 1975 है, क्योंकि इसी दिन फिल्म मुंबई के मिनरवा थिएटर में लगी थी। इसके बाद 15 अगस्त से देश के बाकी जगह रिलीज हुई थी। आज के दौर में यह फिल्म हर दो-तीन दिन में किसी न किसी टीवी चैनल पर चलती देखी जा सकती है। फिल्म में दोस्ती, रोमांस, एक्शन और ट्रेजिडी सब कुछ डाला गया है। लेकिन डायरेक्टर की हल्की सी चूक के कारण फिल्म में कई फनी मिस्टेक्स भी देखने को मिलती हैं। नजर डालते हैं ऐसी ही कुछ गलतियों पर, जो हैं तो छोटी-छोटी, लेकिन इनसे बचा जा सकता था। हालांकि, ये गलतियां गौर से फिल्म देखने पर ही समझ आती है।
शोले का सुपरहिट सीन जिसमे धर्मेंद्र टंकी पर चढ़ कर बसंती की बुआ को ब्लैकमेल करके अपनी शादी फिक्स कर लेता है, लेकिन ये बात समझ नहीं आई की जब गांव में बिजली ही नहीं थी तो टंकी पर पानी कैसे चढ़ता था?
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जब डाकू बसंती का पीछा करते हैं तो बसंती अपने तांगे से स्टंट करके लकड़ी के पुल को तोड़ देती है जिससे पीछ से आ रहे डाकू दूसरे रास्ते से आने को मजबूर होते हैं। वीरू को भी पुल टूटा मिलता है। लेकिन जब जय और वीरू बसंती को डाकुओं से बचाकर लौट रहे हैं तो उस सीन में वही लकड़ी का पुल पूरी तरह ठीक मिलता है।
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असरानी ने जेलर की भूमिका निभाई थी, जो अक्सर कहते थे, हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं। इस फिल्म के एक सीन में नाई बने केश्टो मुखर्जी उनके पास जय और वीरू के जेल से भागने का प्लान बताने जाता हैं। उस समय घड़ी में तीन बज रहे होते हैं। इसके बाद जब जय और वीरू जेलर से मिलने जाते हैं, तब भी घड़ी की सूई तीन पर ही अटकी रहती है।
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जब गब्बर अपने तीन डाकुओं को गोली मारता है तो वो तीनों गब्बर के ठीक आमने-सामने खड़े दिखाए गए हैं। गब्बर तीनों को सामने से गोली मारता है लेकिन डाकुओं की पीठ और पीछे गर्दन पर गोली लगी दिखाई गई है।
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बसंती पैदल ही मंदिर जाती है। यहां तक कि वीरू भी पूछता है कि तुम्हारी धन्नो कहां है। लेकिन जब वो मंदिर से लौटती है तो तांगा बाहर इंतजार कर रहा होता है। बसंती तो इसे घर छोड़कर आई थी। ये मंदिर के बाहर कैसे आ गया।
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आखिरी सीन में जब जय पुल के पास आता है तो उसकी दोनों हथेलियां खुली दिखती हैं। लेकिन जब वो वीरू की बांह में दम तोड़ता है तो वीरू को उसके एक हाथ में सिक्का मिलता है। जय ने मरते समय सिक्का जेब से निकाल लिया था क्या?
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डाकुओं से लड़ते समय जय जमीन पर गिरते हुए पिस्तौल चलाता है। उसकी एक गोली से दो डाकू घोड़े से गिरकर मर जाते हैं। एक गोली से दो लोग कैसे मर गए?
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ठाकुर जब गांव लौटता है तो उसके परिजनों के कफन लिपटे शव पड़े देखता है। ठाकुर बच्चे के शरीर से कफन हटाता है और वो कफन हवा में उड़ जाता है। लेकिन अगले ही सीन में जब ठाकुर गब्बर को मारने के लिए के लिए घोड़ा दौड़ाता है तो बच्चे के शव पर कफन पूरी तरह ढका हुआ होता है।
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परिवार खत्म होने पर जब ठाकुर गांव आता है तो वो काले रंग के घोड़े पर गब्बर को मारने जाता है। लेकिन रास्ते में ही घोड़े का रंग बदल कर भूरा हो गया है। अब घोड़े का रंग बदला है या घोड़ा, कहा नहीं जा सकता।
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फिल्म को ध्यान से देखें तो क्लाइमैक्स में ठाकुर बलदेव सिंह जब गब्बर को मारता है तो कुर्ते की बांह से उसके हाथ दिखाई देते हैं। यह मिस्टेक फिल्म की एडिटिंग के दौरान हुई।
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