‘दृश्यम’ के डायरेक्टर जीतू जोसेफ ने 13 साल बाद एक इंटरव्यू में माना कि फिल्म लिखते वक्त उनसे एक बड़ी चूक हुई थी। जानिए क्यों दर्शकों का फैसला उनकी सोच से बिल्कुल उलट था।
अजय देवगन की हिंदी क्राइम थ्रिलर 'दृश्यम द कन्क्लूजन' बॉक्स ऑफिस पर सरपट दौड़ रही है। तीन दिन में इस फिल्म ने दुनियाभर में ही नहीं, भारत में ग्रॉस कलेक्शन के मामले में भी 200 करोड़ रुपए का आंकड़ा पार कर लिया है। मेकर्स के मुताबिक़, यह फिल्म भले ही मलयालम की मोहनलाल स्टारर 'दृश्यम 3' की रीमेक नहीं है। लेकिन इस फ्रेंचाइजी की पहली फिल्म मलयालम फिल्म की ही रीमेक है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि डायरेक्टर जीतू जोसेफ को 'दृश्यम' बनाने का आइडिया कहां से आया था? खुद जीतू ने एक इंटरव्यू के दौरान उस घटना का जिक्र किया था, जिसने उन्हें 'दृश्यम' की कहानी लिखने के लिए प्रेरित किया।
'दृश्यम' की कहानी सच्ची घटना पर आधारित
इसी साल मई में जब मोहनलाल स्टारर मलयालम फिल्म 'दृश्यम 3' रिलीज हुई, तब एक प्रमोशनल इंटरव्यू के दौरान जीतू जोसेफ ने फिल्म की कहानी के पीछे के आइडिया पर बात की थी। उन्होंने फ्रेंचाइजी की पहली फिल्म 'दृश्यम' (2013) की रिलीज के लगभग 13 साल बाद यह माना था कि पहली फिल्म की कहानी लिखते समय उनकी एक सोच थी, जो दर्शकों के रिएक्शन के बाद गलत साबित हुई। जीतू ने यह भी बताया कि आखिर किस असली घटना ने उन्हें ‘दृश्यम’ की कहानी लिखने का आइडिया दिया था।
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वो मामला, जहां से निकला ‘दृश्यम’ का आइडिया?
जीतू जोसेफ के मुताबिक, ‘दृश्यम’ की कहानी का बीज एक असली पारिवारिक विवाद से निकला था। यह मामला एक लड़के और लड़की से जुड़ा था और बाद में पुलिस केस तक पहुंच गया था। उन्होंने बताया कि उस समय किसी शख्स ने उनसे कहा था कि इस विवाद में दोनों परिवार अपनी-अपनी जगह सही भी थे और गलत भी। सवाल यह था कि ऐसी स्थिति में आखिर किसका पक्ष लिया जाए। जीतू के मुताबिक, यही सवाल उनके दिमाग में लंबे समय तक घूमता रहा।
दर्शकों को लेकर जीतू जोसेफ की क्या उम्मीद थी?
जीतू ने बताया कि यह घटना साल 2000 की थी, जब वह फिल्म इंडस्ट्री में आए भी नहीं थे। वह सोचने लगे कि अगर ऐसी नैतिक रूप से उलझी हुई कहानी थिएटर में दिखाई जाए, तो दर्शक किसके साथ खड़े होंगे। उनके मन में सवाल था कि क्या दर्शकों का मन दोनों पक्षों के बीच लगातार झूलता रहेगा? इसी विचार ने आगे चलकर ‘दृश्यम’ का रूप लिया।
पहली ‘दृश्यम’ में जीतू जोसेफ को अपनी कौन-सी गलती लगी?
फिल्म पूरी होने के बाद जीतू को एहसास हुआ कि उन्होंने दर्शकों को लेकर गलत अनुमान लगाया था। उन्हें उम्मीद थी कि दर्शक दोनों परिवारों के बीच बंटे रहेंगे, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं हुआ। जीतू ने कहा, “फिल्म देखने के बाद मुझे लगा कि मुझसे गलती हुई थी, क्योंकि वह संतुलन बना ही नहीं। हर कोई मजबूती से जॉर्जकुट्टी (मोहनलाल) और उसके परिवार के साथ खड़ा था।” जीतू जोसेफ ने गीता प्रभाकर (आशा शरत) के किरदार का पक्ष भी रखा। उनका कहना था कि एक मां के तौर पर अपने लापता बेटे को ढूंढना और सच्चाई जानने की कोशिश करना उसके लिए स्वाभाविक था।
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उन्होंने कहा, “अगर आप सोचें तो क्या हम वाकई गीता प्रभाकर को दोष दे सकते हैं? उसका बेटा गायब हो गया है और वह सच जानने के लिए बेताब है। उसकी नजर से देखें तो जॉर्जकुट्टी हर चीज को अपने हिसाब से मोड़ रहा है। वह इसे कैसे सहन करती? उसके बेटे ने उसे अपनी गलती कभी बताई ही नहीं थी, इसलिए वह सच्चाई पर विश्वास करने के लिए तैयार नहीं थी। एक मां के तौर पर वह सच से अनजान थी। यही ‘दृश्यम’ की मूल चिंगारी थी।”
