Published : Mar 02, 2020, 06:30 PM ISTUpdated : Mar 02, 2020, 06:38 PM IST
केरल. मुसीबत में हर शख्स दुम दबाकर भागने की कोशिश करता है। पर बहुत बार ऐसे बहादुर लोग भी होते हैं जो मुसीबत के समय अपनी हिम्मत और सूझ-बूझ से दुनिया को हैरान कर देते हैं। ऐसे ही मात्र 16 साल के बच्चे ने एक बड़े हादसे के दौरान घबराने की बजाय अपना पराक्रम दिखाया। कोझिकोड के रहने वाले आदित्य के. एक बहादुर बालक हैं। उन्होंने नेपाल टूर पर हुए एक बस हादसे में 20 लोगों की जान बचाई थी। आग की तेज लपटें उठ रही थीं, धुआं बस में भर चुका था लेकिन वो घबराया नहीं बल्कि बुजुर्गों की जान बचाने में जुट गया था।
आदित्य को उनके इस काम के लिए राष्ट्रीय बहादुरी पुरस्कारों का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार दिया गया। भारत सरकार ने आदित्य को साल 2019 में वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया। आज हम आपको उस पूरी घटना के बारे में बताने वाले हैं कैसे हादसा हुआ और बस में कितने लोग सवार थे। कैसे आदित्य ने लोगों की जान बचाई?
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आदित्य कोझीकोड के रमनट्टुकारा से हैं। वो या तो स्कूल जाते थे या खाली टाइम में फुटबॉल खेलते रहते थे। एक दिन आदित्य की दादी को कालीकट विश्वविद्यालय के पेंशनर बुजुर्गों के लिए जा रहे नेपाल टूर का निमंत्रण मिला। इस टूर में ज्यादा पेंशनर सीनियर सिटिजन ही यात्री थे। बुजुर्गों के साथ उनके परिवार के कुछ लोग भी गए थे। इसलिए आदित्य दादी और मां-बाप के साथ 25 अप्रैल को टूर पर निकल गए। आदित्य टूर और हादसे से जुड़ी सारी बातें बताते हैं। मीडिया को उन्होंने बताया कि, कुल 72 लोग एक साथ सफर कर रहे थे, सब हंसते-गाते जा रहे थे। हमने लुम्बिनी, काठमांडू और पोखरा की यात्रा की। तब तक सब ठीक चल रहा था।
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फिर हमने नेपाल से लखनऊ हवाई अड्डे के लिए दो ए / सी पर्यटक बसों में 1 मई को अपनी वापसी का सफर शुरू किया। जिस बस में मैं यात्रा कर रहा था उसमें 43 यात्री थे और हम भारतीय सीमा से 60 किलोमीटर दूर थे और दून नामक जगह पर पहुंचे। बस में चाची में से एक ने पीछे से आ रहे धुएं को देखा। जब यात्रियों ने ड्राइवर को इस बारे में बताया, तो उन्होंने इसे अनदेखा कर दिया और कहा कि यह शायद धूल होगी। लेकिन जब यात्रियों ने डीजल पिघलते देखा तो सब घबराने लगे और बस को रोक दिया।
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बस में आग लग चुकी थी, मेरे पिता, टूर ऑपरेटर और कुछ जो हमारे साथ यात्रा कर रहे थे, वे बाहर निकले और देखने गए कि क्या गलत है। अचानक एसी वेंट के जरिए काला धुआं बस में घुसने लगा और बस के सामने के हिस्से में आग लग गई। मैंने लोगों की चीखें सुनी लोग मदद के लिए चिल्ला रहे थे। हालात इसलिए ज्यादा खराब थे क्योंकि बस में अधिकतर बुजर्ग थे तो भाग-दौड़ नहीं सकते थे इसलिए मैं उनकी मदद को कूद पड़ा।
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अदित्य के पिता अनीश, जो बाहर खड़े थे उन्होंने कुछ खिड़कियां तोड़ दीं ताकि धुआं बच जाए लेकिन वह ज्यादा नहीं कर सके क्योंकि तब तक बस और भी ज्यादा जलने लगी थी। हालत बिगड़ने लगे और हम धुएं के कारण सांस तक नहीं ले पा रहे थे। अब आदित्य ने सोचा कि, मुझे कुछ करना होगा इसलिए वो बस में जरूरी चीज ढूंढ़ने लगे। उन्हें एक हथौड़ा मिला जो चमत्कार की तरह था। मैंने अपनी सारी ताकत का इस्तेमाल करते हुए हथौड़े से बस का पिछला शीशा तोड़ दिया। उस वक्त सभी लोग मुझे उम्मीद की नजर से देख रहे थे।
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इस दौरान उनके हाथ और पैरों में शीशे से चोटें भी लगीं। आदित्य की यह वीरता ही थी कि बस के डीजल टैंक के फटने से पहले सभी लोग बाह निकल गए और जिंदा जलने से बच गए। मासूम बच्चे ने हथौड़ा उठाकर अपनी वीरता का परिचय पहले ही दे दिया था। इस तरह बहादुर आदित्य ने 20 लोगों को बचाया और बाकी सभी घायल लोग भी सुरक्षित बच गए।
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आदित्य कहते हैं कि, "मैं किसी भी तरह से शारीरिक रूप से कोई बॉडी बिल्डर या ट्रेनर नहीं हूं लेकिन पता नहीं लोगों की जान बचाने के लिए मुझमें कहां से ताकत आ गई।" बेटे की वीरता और जज्बा देख पिता अनीश ने आदित्य को कसकर गले लगा लिया। उन्होंने बेटे की पीठ थपथपाई और बाद में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आदित्य को वीरता पुरस्कार से सम्मानित कर शाबाशी दी।
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