Published : May 29, 2020, 04:19 PM ISTUpdated : May 29, 2020, 04:59 PM IST
नई दिल्ली. छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री अजीत जोगी का निधन हो गया। उन्हें बुधवार रात करीब 1 बजे दिल का दौरा पड़ा। तभी से उन्हें हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। उन्हें 19 दिन के भीतर तीन बार दिल का दौड़ा पड़ा। शुक्रवार को भी उन्हें दौरा पड़ा था, इसके बाद उन्हें विशेष इंजेक्शन भी लगाया गया था। अजीत जोगी के निधन के जानकारी उनके बेटे अमित जोगी ने दी। अमित जोगी ने ट्वीट किया, वेदना की इस घड़ी में मैं निशब्द हूं। परम पिता परमेश्वर माननीय अजीत जोगी जी की आत्मा को शांति और हम सबको शक्ति दे। उनका अंतिम संस्कार उनकी जन्मभूमि गौरेला में कल होगा।
अजीत जोगी मैकेनिकल इंजीनियरिंग में गोल्ड मेडलिस्ट थे। अजीत जोगी IAS की नौकरी छोड़कर राजनीति में आए थे। सालो तक कांग्रेस के बड़े नेताओ में शुमार रहे और बाद में अपनी अलग पार्टी के साथ छत्तीसगढ़ की राजनीती में नया समीकरण बैठाया।
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अजीत जोगी 1968 में आईपीएस बने और दो साल बाद आईएएस। लगातार 14 साल तक जिलाधीश बने रहे। वह इंदौर के कलेक्टर रहे तथा रायपुर में भी उन्हें कलेक्टर का पद मिला।
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रायपुर में कलेक्टर रहने के दौरान वे पुलिस लाइन से घोड़े मंगवाकर रोज सुबह राइडिंग करते हुए शहर का मुआयना करते थे। आईएएस ट्रेनिंग के दौरान उन्हें हॉर्स राइडिंग के नियमों के बारे में बताया गया था, जिससे उनकी घुड़सवारी में और निखार आ गया।
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BHOPAL के MACT (MANNIT) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके कुछ दिन रायपुर इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन का काम किया।
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1968 में UPSC में सफल हुए और IPS बने। दो साल बाद ही वे IAS बन गए।
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14 साल मध्यप्रदेश में कलेक्टर रहे। ज्यादातर नियुक्ति उन्हीं जिलों में मिली, जो राजनीतिक क्षत्रपों के प्रभाव क्षेत्र माने जाते रहे।
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वे इंदौर कलेक्टर तब रहे जब MP में CM प्रकाश चंद सेठी थे। वहां सेठी की छत्रछाया रही।
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रायपुर में भी कलेक्टर का पद मिला, जो शुक्ला बंधुओं के प्रभाववाला क्षेत्र था। सीधी पोस्टिंग रही, जो अर्जुन सिंह का क्षेत्र था। वहां उनकी नजदीकियां हो गईं। ग्वालियर में भी कलेक्टर रहते हुए उनकी नजदीकियां माधवराव सिंधिया घराने से हो गई थी।
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रायपुर में कलेक्टर थे, उस समय राजीव गांधी के संपर्क में आ गए। जब राजीव गांधी रायपुर रुकते थे तो एयरपोर्ट पर जोगी खुद उनकी आवभगत के लिए पहुंच जाते थे। बताया जाता है कि इस खातिरदारी ने उन्हीं राजनीतिक की टिकट दिला दी।
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कांग्रेस प्रवक्ता रहने के साथ ही जोगी दो बार राज्यसभा के सदस्य बने। 1998 में रायगढ़ से चुनाव लड़कर पहली बार लोकसभा पहुंचे। लेकिन, 1999 में वे शहडोल से चुनाव हार गए थे।
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नवंबर 2000 में छत्तीसगढ़ गठन के दौरान उनके राजनीतिक केरियर में बड़ा बदलाव आया और उन्हें छघ के पहले मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला। अपने तेवरों और विवादों के कारण वे सबसे चर्चित CM भी रहे।
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BJP से रमन सिंह के सत्ता में आने के बाद उन पर सरकार गिराने के लिए विधायकों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगा। वर्ष 2005 में उन्हें इन्हीं आरोपों के चलते कांग्रेस ने निलंबित किया।
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अंतागढ़ उपचुनाव में भी कांग्रेस प्रत्याशी मंतूराम पवार की नाम वापसी को लेकर सौदेबाजी के आरोप लगे। बाद में उनका ऑडियो वायरल हो गया। इस पर जोगी के बेटे अमित जोगी को निष्कासित किया गया। इससे अजीत जोगी खुद को उपेक्षित और पार्टी में अलग-थलग पड़ गए।
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जिन्होंने सीएम की कुर्सी तक पहुंचाया, उन्हीं के खिलाफ खोल दिया मोर्चा
1985 की बात है। अजीत जोगी इंदौर के कलेक्टर थे। उनके बंगले पर फोन आया। दूसरी तरफ से आवाज आई, तुम्हारे पास ढाई घंटे हैं। सोच लो। राजनीति में आना है या कलेक्टर ही रहना है। दिग्विजय सिंह लेने आएंगे, उनको फैसला बता देना। फोन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पीए वी जॉर्ज का था। अजीत जोगी ने फोन उठाया और राजनीति में आने का फैसला कर लिया। अजीत जोगी ने अर्जुन सिंह को अपना गॉडफादर मान लिया था और दिग्विजय सिंह के खिलाफ के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया।
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