असम में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के बीच बैनर-पोस्टर छोड़िए...असमिया संस्कृति का प्रतीक गमछा(गमोसा) मीडिया की सुर्खियों में है। पार्टी कोई भी हो, उसके नेताओं के गले में असम पहुंचने पर गमोसा लटका जरूर देखा जाता है। प्रधानमंत्री मोदी, प्रियंका-राहुल गांधी यहां तक कि KBC में अमिताभ बच्चन भी गमोसा पहने दिखे। आपको बता दें कि असम में परंपरागत रूप से प्रचलित गमोसा सूती कपड़े से बनता है। कोरोनकाल में इसका उपयोग मॉस्क के तौर पर खूब जा रहा है। गमछा असम के लोगों की सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान का एक अभिन्न वस्त्र है। परंपरागत रूप से गमछे में तीन तरफ लाल रंग के किनारे होते हैं। जबकि चौथा किनारा खुला होता है। खुले हुए मुंह पर मिले-जुले रंगों से स्थानीय और प्राकृतिक चित्रकारी होती है। इन कलाकृतियों को बनाने में मुख्यत: लाल रंग का इस्तेमाल होता है। इस समय यह गमछा राजनीति के रंग में रंगा हुआ है। आइए पढ़ते हैं गमछे की सांस्कृतिक-सामाजिक और राजनीति पहचान...
इनसेट में दिखाई दे रही तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कोरोना का पहला टीका लगवा रहे हैं। वे सोमवार सुबह असम का गमछा गले में डालकर दिल्ली AIIMS पहुंचे थे। यहां पुडुचेरी की सिस्टर पी निवेदा ने मोदी को टीका लगाया। केरल की सिस्टर रोसम्मा अनिल पास में खड़ी थीं।
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मोदी की यह तस्वीर मीडिया से लेकर सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है। वैसे मोदी असमिया गमछे को कई मौके पर पहने देखे जाते रहे हैं। बता दें कि असम में तीन चरणों-27 मार्च, 1 और 6 अप्रैल को वोटिंग होगी। मतगणना 2 मई को होगी।
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कांग्रेस ने प्रिंट कराए Anti-CAA मैसेज वाले गमछे
कांग्रेस ने भी असम के गमछे को राजनीति हथियार बनाया है। पिछले दिनों असम के शिवसागर जिले में एक चुनावी सभा में राहुल गांधी असमिया गमछा पहने दिखे थे। उनके साथ बाकी नेताओं ने भी गमछा पहना हुआ था। इस बीच कांग्रेस ने एक लाख घरों से सीएए विरोधी संदेशों (Anti-CAA Messages) वाले गमछे इकट्ठा किए हैं। इसके जरिये यह बताने की कोशिश है कि असम के लोग CAA के खिलाफ हैं।
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असमिया गमछे को लेकर कोई भी पार्टी मौका छोड़ना नहीं चाहती। जब भी मौका मिलता है, असमिया गमछा ओढ़ लिया जाता है। प्रियंका गांधी भी कई मौके पर असमिया गमछा पहने दिखीं।
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यह तस्वीर कौन बनेगा करोड़पति की है। जब गुवाहाटी की बिनीता जैन पहली करोड़पति बनी थीं, तब उन्होंने अमिताभ बच्चन को असमिया गमछा फुलाम या फूलम (Phulam) भेंट किया था।
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बता दें कि असम में दो तरह के परंपरागत गमछे बुने जाते हैं। इन्हें 'उका' (Uka) और 'फूलम' (Phulam) कहते हैं। उका आमतौर पर सादे रंग के टुकड़े होते हैं। इनका इस्तेमाल गर्मियों में और नहाने के बाद किया जाता है। जबकि फूलम विशेष अवसरों पर होता है। जैसे-बिहू(रंगोली बिहू)
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गमछा को असमी राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में पहचान 1916 में मिली। तब 'असोम छात्र संमिलन' और 'असमिया साहित्य सभा' जैसे संगठन सामने आए थे।
वर्ष 1979 से 1985 के असम आंदोलन के दौरान गमछा राजनीतिक विरोध का प्रतीक बन गया। यह आंदोलन विदेशी लोगों के खिलाफ था।
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उल्फा उग्रवादी समूह भी गमछा प्रयोग किया करते थे। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 के विरोध के दौरान भी यह राजनीतिक एकता व विरोध के लिए गमछा इस्तेमाल किया गया।
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