क्या NCPI का बंगाल की राजनीति पर असर पड़ सकता है? TMC के बागी सांसदों के लिए NCPI क्यों बनी नया राजनीतिक मंच? क्या NCPI का उदय पश्चिम बंगाल की राजनीति में नए समीकरण बना सकता है? क्या NCPI अब पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा खिलाड़ी बन सकती है?
Nationalist Citizens Party of India: लोकसभा में पर्याप्त संख्या होने के बावजूद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बागी सांसदों ने पार्टी पर दावा पेश करने के बजाय नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने का रास्ता चुना। NCPI को अब तक एक छोटी और लगभग निष्क्रिय राजनीतिक पार्टी माना जाता रहा है। त्रिपुरा चुनाव में NCPI से जुड़े उम्मीदवारों को कुल मिलाकर केवल 1,198 वोट मिले। कोई भी उम्मीदवार जीत की दौड़ में नहीं पहुंच सका। ऐसे में एक ऐसी पार्टी, जिसका अभी लोग ठीक से नाम तक नहीं जानते, उसमें विलय करने के पीछे आखिर क्या वजह है? राजनीतिक विश्लेषकों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बागी सांसदों के इस फैसले के पीछे कई रणनीतिक कारण रहे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण कारण तृणमूल कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा और पार्टी का संविधान माना जा रहा है। आइए जानते हैं इस विलय के सबसे बड़े कारण।

1- TMC का संविधान बना बड़ी बाधा
राजनीतिक जानकारों के अनुसार, बागी सांसदों की रणनीति बदलने की सबसे बड़ी वजह तृणमूल कांग्रेस का संविधान रहा। चुनाव आयोग को सौंपे गए पार्टी संविधान के मुताबिक, शुरुआत में राज्य कार्यकारी समिति (State Executive Committee) को पार्टी की सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था माना गया था। हालांकि, बाद में संविधान में संशोधन कर राष्ट्रीय कार्यसमिति (National Executive Committee) को सर्वोच्च निर्णय लेने वाली संस्था का दर्जा दे दिया गया। एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह राष्ट्रीय कार्यसमिति काफी हद तक पार्टी अध्यक्ष ममता बनर्जी के नेतृत्व और प्रभाव के तहत काम करती है।
2- संगठन पर ममता बनर्जी खेमे का मजबूत नियंत्रण
तृणमूल कांग्रेस के संगठनात्मक ढांचे में चुने हुए सांसदों और विधायकों की तुलना में संगठन के पदाधिकारियों को अधिक महत्व दिया गया है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति और अन्य प्रमुख संगठनात्मक पदों पर वे नेता मौजूद हैं जिन्हें ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी का करीबी माना जाता है। ऐसी स्थिति में भले ही बागी सांसदों के पास लोकसभा में पर्याप्त संख्या हो, लेकिन उनके लिए पार्टी संगठन पर कंट्रोल पाना बेहद मुश्किल था। यही वजह मानी जा रही है कि बागी सांसदों की वह योजना सफल नहीं हो सकी, जिसके तहत वे पहले लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी पर नियंत्रण स्थापित करना चाहते थे और बाद में पार्टी के चुनाव चिह्न तथा फंड पर दावा करना चाहते थे।
3- भाजपा की भूमिका को लेकर भी उठे सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बीच भारतीय जनता पार्टी (BJP) की संभावित भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। सीपीआई (एम) के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास रंजन भट्टाचार्य का दावा है कि इस राजनीतिक रणनीति के पीछे भाजपा की भूमिका हो सकती है। उनका कहना है कि नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता भूपेंद्र यादव के आवास पर बागी सांसदों की कई बैठकों का होना इस दिशा में संकेत देता है। भट्टाचार्य के अनुसार, भाजपा का मुख्य उद्देश्य संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए बागी तृणमूल सांसदों का समर्थन सुनिश्चित करना हो सकता है। उन्होंने कहा कि इसी वजह से बागी सांसदों को तृणमूल कांग्रेस की संसदीय पार्टी पर कब्जा करने की लंबी और अनिश्चित प्रक्रिया में उलझाने के बजाय किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी में शामिल कराने की रणनीति अपनाई गई। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और यह संबंधित पक्षों के राजनीतिक आरोपों और विश्लेषणों पर आधारित हैं।
4- पश्चिम बंगाल विधानसभा और लोकसभा की स्थिति में क्या अंतर था?
राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि जब पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस के 80 में से 60 विधायकों के समर्थन वाला बागी गुट सफलतापूर्वक उभर सका, तो लोकसभा में बागी सांसद वैसी ही रणनीति क्यों नहीं अपना सके?विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी द्वारा पहले ही अपनाई गई राजनीतिक रणनीति जिम्मेदार थी।
5- ममता बनर्जी की रणनीति ने कैसे बदला पूरा समीकरण?
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, जैसे ही विधानसभा में बागी विधायकों का बहुमत वाला समूह सामने आया, ममता बनर्जी ने संगठनात्मक स्तर पर बड़ा कदम उठाया। उन्होंने पार्टी की पुरानी आंतरिक समितियों और तृणमूल कांग्रेस से जुड़े विभिन्न जनसंगठनों की समितियों को भंग करने का फैसला किया। इसके बाद नई समितियों के गठन की घोषणा की गई, जिनमें उन नेताओं को प्राथमिकता दी गई जो ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के प्रति वफादार माने जाते थे।
6- संगठन पर पकड़ बनाए रखने में सफल रहीं ममता बनर्जी
विश्लेषकों का मानना है कि इस कदम के जरिए ममता बनर्जी ने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी। भले ही लोकसभा में संसदीय दल और पश्चिम बंगाल विधानसभा में विधायी दल के भीतर उनके सामने चुनौतियां खड़ी हुईं, लेकिन राष्ट्रीय कार्यसमिति और संगठन के प्रमुख हिस्सों पर उनका नियंत्रण बना रहा। इसी वजह से बागी सांसदों के लिए तृणमूल कांग्रेस पर औपचारिक नियंत्रण हासिल करना आसान नहीं था। ऐसे में उन्होंने पार्टी पर दावा करने की जगह NCPI जैसे अलग राजनीतिक मंच का विकल्प चुना।
NCPI में शामिल होना क्यों माना जा रहा है रणनीतिक फैसला?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि NCPI में शामिल होना बागी सांसदों के लिए अपेक्षाकृत आसान और व्यावहारिक रास्ता था। तृणमूल कांग्रेस के संगठन, चुनाव चिह्न और फंड पर दावा करने की प्रक्रिया लंबी और कानूनी रूप से जटिल हो सकती थी। वहीं दूसरी ओर, किसी मौजूदा राजनीतिक पार्टी के साथ जुड़कर वे संसद में अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर सकते थे। इसी कारण NCPI में विलय को केवल एक राजनीतिक कदम नहीं, बल्कि संगठनात्मक और कानूनी चुनौतियों को ध्यान में रखकर लिया गया एक रणनीतिक निर्णय माना जा रहा है।


