एक पैर गंवाने के बाद भी जाबाज ने छुड़ा दिए थे दुश्मनों के छक्के, -19 डिग्री तापमान में चटाई थी धूल

Published : Jul 23, 2020, 04:20 PM IST

नई दिल्ली. साल 1999 में लड़ा गया कारगिल युद्ध करीब 3 महीनों तक भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ा गया था। इस दौरान ना जाने कितने भारत के लाल ने अपनी जान देश के नाम कर दी थी। ऐसे में कारगिल विजय दिवस के मौके पर वीर जवानों की बहादुरी के किस्से बता रहे हैं। आज हम एक ऐसे भारतीय जवान के बारे में बता रहे हैं, जिसने पहले तो सैनिक के रूप में देश की खातिर अपनी जान दाव पर लगा दी और अब शारीरिक अक्षमता के बावजूद खेल के मैदान में दम दिखा रहे हैं। कारगिल युद्ध के ये जवान माइनस 19 डिग्री तापमान में दुश्मनों पर आग बनकर टूट पड़े थे। इस दौरान उन्होंने अपना दायां पैर गवां दिया था और फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे। ये कहानी रिटायर्ड कैप्टन सतेंद्र सांगवान की है। 

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एक पैर गंवाने के बाद भी जाबाज ने छुड़ा दिए थे दुश्मनों के छक्के, -19 डिग्री तापमान में चटाई थी धूल

रिटार्यड कैप्टन सांगवान ने बताया था कि कारगिल युद्ध में उन्हें काली पहाड़ी को दुश्मन के कब्जे से छुड़ाने के आदेश मिले। उन्होंने अपनी 16-ग्रेनेडियर रेजीमेंट के कमांडो और सेकेंड राजपूताना रायफल के साथ 29 जून, 1999 को पहाड़ी पर बनी पाकिस्तानी चौकी नष्ट कर उस पर कब्जे की कोशिश की। दुश्मनों की भारी गोलाबारी में राजपूताना रायफल के तीन अफसर शहीद हो गए। 

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कैप्टन बताते हैं कि अंधेरे में उन्हें ये तक पता नहीं चल रहा था कि फायरिंग कहां से हो रही है। इसी बीच उन्हें दाएं छोर से अटैक करने का आदेश मिला। कमांडो के साथ वो पहाड़ी पर चढ़ने लगे। काली पहाड़ी से लगभग 100 मीटर पहले ऑपरेटर को छोड़ दिया। कुछ दूरी पर दुश्मन नजर आए तो उन्होंने गोलियां बरसानी शुरू कर दी, यह देख दुश्मन भाग खड़े हुए। 
 

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सांगवान ने कहा था कि रात के साढ़े 11 बज चुके थे। अंधेरे में बामुश्किल 10 मीटर ही नीचे की ओर वो चले थे कि दायां पैर माइन पर पड़ गया। वो धमाके के साथ कुछ मीटर हवा में उड़े और एक चट्टान से जा टकराए। इसके बाद उन्होंने उठने की कड़ी कोशिश की तो देखा कि दायां पैर उनका ब्लास्ट से उड़ चुका था। 

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कैप्टन के कराहने की आवाज सुनकर साथी जवान उनकी तरफ बढ़े, लेकिन उन्होंने उन्हें पहाड़ी पर कब्जे का आदेश दिया। टांग गंवाने के बावजूद उन्हें मिशन पूरा करने की खुशी थी।
 

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सेना से रिटायरमेंट के बाद कैप्टन सांगवान को ओएनजीसी में सेवा का मौका मिला। दून निवासी सांगवान फिलहाल दिल्ली ओएनजीसी हेडक्वार्टर में तैनात हैं। वहां, रहते हुए उन्होंने बैडमिंटन रैकेट थामकर देश सेवा की राह चुनी। 2004 से 2010 के बीच विभिन्न प्रतियोगिताओं में कैप्टन सांगवान पैरालंपिक बैडमिंटन में नेशनल चैंपियन बने। 
 

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राष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने आठ स्वर्ण, पांच रजत और पांच कांस्य पदक के साथ कुल 18 पदक जीते। इतना ही नहीं, कैप्टन सांगवान के नाम एवरेस्ट फतह का रिकॉर्ड भी है। 2017 में ओएनजीसी के दल प्रमुख होते हुए एवरेस्ट फतह किया था। विभिन्न खेलों में उत्तम प्रदर्शन के लिए उन्हें 2009 में तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा 'बेस्ट रोल मॉडल इन सोसायटी' के रूप में सम्मानित किया गया। अब वह बेहतरीन मैराथन रनर भी हैं।

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