डांग, गुजरात. यह तस्वीर गरीब और ग्रामीण अंचलों से आने वाले खिलाड़ियों की असल जिंदगी दिखाती है। ये देश के लिए भले सोना-चांदी जीतकर ले आएं, लेकिन घर आकर इन्हें इसी तरह जरूरी चीजों के लिए जूझना पड़ता है। देश का नाम रोशन करने वालीं ये धावक हैं सरिताबेन लक्ष्मणभाई गायकवाड़। गोल्ड मेडलिस्ट सरिता जिस गांव में रहती हैं, वहां पानी की किल्लत है। गर्मियों में खासकर पूरा गांव बूंद-बूंद को तरस जाता है। ऐसे में सरिता को खुद एक किमी दूर एक कुएं से पानी भरकर लाना पड़ता है। सरिता डांग जिले के आदिवासी बाहुल्य गांव करड़ी आंबा में रहती हैं। इनकी आर्थिक स्थिति कुछ खास नहीं है। जैसे आम आदिवासी परिवार रहते हैं, वैसे ही सरिता भी रहती हैं। जून, 1994 को जन्मी सरिता ने सबसे पहले 2010 में राज्यस्तरीय खोखो प्रतियोगिता में हिस्सा लिया था। 2018 में 400 मीटर की दौड़ के लिए भारतीय महिला टीम में सरिता का चयन किया गया था। वे गुजरात से चयनित पहली महिला थीं। सरिता ने 400 मीटर रिलेदौड़ में देश को गोल्ड दिलाया था। इस गोल्ड ने कॉमनवेल्थ गेम में भारत को गौरव दिलाया था। सरिता गुजरात सरकार के बेटी बचाओ अभियान की ब्रांड एम्बेसडर हैं। जानिए इनकी पूरी कहानी...
सरिता हाल में ओलंपिक की तैयारियों के लिए पोलैंड गई थीं। वे पंजाब के एक सेंटर में दो महीने की ट्रेनिंग के लिए गई थीं, लेकिन लॉकडाउन के चलते गांव लौटना पड़ा। सरिता रोज कुएं से पानी भरकर लाते देखी जा सकती हैं।
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सरिता बताती हैं कि उनके गांव में पानी की किल्लत है। उनके पिता लक्ष्मणभाई ने बताया कि हर गर्मी में यहां पानी की समस्या होती है। सरकार ने यहां डेम निर्माण का काम शुरू किया है, लेकिन वो कब खत्म होगा, नहीं मालूम।
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सरिता जिस इलाके में रहती हैं, वहां बारिश में 100 इंच तक बारिश होती है, लेकिन जलसंरक्षण का कोई उपाय नहीं होने से दिक्कत बनी रहती है। सरिता बताती हैं कि उनका एरिया सागौन के जंगलों के लिए प्रसिद्ध है।
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सरिता के मां-बाप किसानी करते हैं। परिवार में एक बहन और छोटा भाई है।
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घर-परिवार की जिम्मेदारियों के बावजूद सरिता मुस्कराते हुए कहती हैं कि वे देश के लिए अभी और खेलेंगी।
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