Published : Jan 12, 2021, 10:55 AM ISTUpdated : Jan 12, 2021, 11:06 AM IST
युवाओं के लिए प्रेरक व्यक्तित्व स्वामी विवेकानंद का 12 जनवरी को जन्मदिन है। नरेंद्रनाथ दत्त उर्फ विवेकानंद का जन्म 1863 में कलकत्ता(अब कोलकाता) में हुआ था। 1863 में अमेरिका के शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत की ओर से सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वामीजी ने जो भाषण दिया था, वो आज भी याद किया जाता है। स्वामीजी ने ही रामकृष्ण मिशन की स्थापना की थी। वे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे। शिकागो में उन्हें बोलने के लिए 2 मिनट का समय दिया गया था, लेकिन जब उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत-'मेरे अमेरिकी बहनों और भाइयों' से की, तो सबका दिल जीत लिया था। विवेकानंद ने अमेरिका के अलावा इंग्लैंड, यूरोप आदि देशों में हिंदू दर्शन का प्रसार-प्रचार किया। उनके जन्मदिन को युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। पढ़िए उनसे जुड़े कुछ किस्से और प्रेरक विचार...
एक बार स्वामीजी के आश्रम में एक व्यक्ति पहुंचा। उसने कहा कि मन लगाकर मेहनत करने के बावजूद उसे सफलता नहीं मिलती। स्वामीजी ने कहा वो इसका समाधान खोजते हैं, तब तक वो पालतू कुत्ते को घुमाकर लाए। कुछ देर बाद आदमी लौटा, तो कुत्ते के हांफने की वजह पूछी। आदमी ने कहा कि कुत्ता आड़ा-टेड़ा भाग रहा था। स्वामीजी ने कहा कि यह तुम्हारी समस्या है। मंजिल सामने होकर भी हम इधर-उधर भागते हैं।
210
एक बार स्वामीजी बनारस गए थे। वहां मंदिर से लौटते समय बंदरों का झुंड उनके पीछे पड़ गया। वो प्रसाद छीनना चाहता था। स्वामीजी डरके मारे भागने लगे। तभी एक बुजुर्ग ने उनसे हंसकर कहा कि डरो मत, सामना करो। स्वामीजी रुक गए। इसके बाद बंदर वहां से भाग गए। इससे स्वामीजी ने सीखा कि समस्या का मुकाबला करना चाहिए।
310
एक विदेश महिला ने स्वामीजी से शादी करने का प्रस्ताव रखा। स्वामीजी ने कहा कि वो तो संन्यासी हैं। महिला बोली कि वो उनके जैसा बेटा चाहती है। यह सुनकर स्वामीजी ने महिला से कहा कि ठीक है, आज से वे उसके बेटे हुए। महिला ने यह सुना, तो वो गदगद हो उठी। (अपने अनुयायियों के साथ बीच में बैठे स्वामीजी)
410
यह किस्सा तब का है, जब वे उतने प्रसिद्ध नहीं हुए थे। वे जयपुर में थे। वहां के राजा उनके बड़े भक्त थे, इसलिए स्वामीजी को अपने महल बुलवाया। राजा-महाराजा जब किसी मेहमान को अपने महल बुलवाते हैं, तो वहां नाच-गाने का प्रबंध होता है। इसी रस्म को निभाते हुए राजा ने स्वामीजी के स्वागत में एक सुंदर वेश्या को भेजा। लेकिन फिर राजा को गलती का एहसास हुआ कि स्वामीजी तो संन्यासी हैं। वेश्या को देखकर स्वामीजी डर गए कि कहीं उनकी वासना न जाग जाए, इसलिए उन्होंने खुद को एक कमरे में बंद कर दिया। यह देखकर वेश्या को दु:ख हुआ। उसने अपने नाच-गाने में अपनी व्यथा पेश की। यह सुनकर स्वामीजी का डर दूर हुआ। उन्होंने उस वेश्या को पवित्र आत्मा कहा। जिसके कारण उनके मन के अंदर की वासना दूर हुई। (स्वामीजी और उनकी मां)
510
स्वामीजी को बचपन में उनके परिवारवाले वीरेश्वर कहकर पुकारते थे। इनके पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रसिद्ध वकील थे। वहीं, दादा दुर्गाचरण दत्त संस्कृत और फारसी के बड़े विद्वान।
610
स्वामीजी ने 25 साल की उम्र में घर छोड़कर संन्यास ले लिया था। इनकी मां भुवनेश्वरी देवी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं। उनका ज्यादातर समय शिवजी की पूजा-अर्चना में जाता था। स्वामीजी पर इसका गहरा असर पड़ा।
710
1871 में जब विवेकानंद 8 साल के थे, तब उन्होंने ईश्वरचंद विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन संस्थान में एडमिशन लिया। 1877 में उनका परिवार रायपुर चला गया। 1879 में फिर कलकत्ता लौटा। विवेकानंद ऐसे इकलौते छात्र थे, जिन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज की प्रवेश परीक्षा में फर्स्ट डिविजन हासिल की थी।
810
विवेकानंद जी फिटनेस को लेकर हमेशा सजग रहते थे। वे नियमित रूप से व्यायाम करते थे और खेलों में शामिल होते थे। दूसरों को भी वे यही सीख देते थे।
910
25 वर्ष की आयु में स्वामीजी ने गेरुआ कपड़े पहन लिए थे। इसके बाद पैदल ही पूरे देश की यात्रा की। विवेकानंद ने 31 मई, 1893 से अपनी यात्रा शुरू की। वे जापान, चीन और कनाडा होते हुए अमेरिका के शिकागो पहुंचे थे।
1010
स्वामीजी सिर्फ 39 साल में वो काम कर गए, वो कई शताब्दियों तक लोगों को प्रेरणा देता रहेगा। गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर ने उनके बारे में कहा था कि यदि आप भारत को जानना चाहते हैं, तो विवेकानंद को पढ़िए।
वायरल न्यूज(Viral News Updates): Read latest trending news in India and across the world. Get updated with Viral news in Hindi at Asianet Hindi News