
15 August 1947 History: आज जब 15 अगस्त का नाम आता है, तो आंखों के सामने लाल किला, प्रधानमंत्री का भाषण, तिरंगा और राष्ट्रगान की तस्वीर आती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत के पहले स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त 1947 की तस्वीर आज से काफी अलग थी? उस दिन लाल किले से न तिरंगा फहराया गया था और ना ही राष्ट्रगान 'जन-गण-मन' गाया गया था। दिल्ली में आजादी का जश्न जरूर था, लेकिन देश का माहौल सिर्फ खुशी वाला नहीं था। बंटवारे का दर्द भी लोगों के बीच मौजूद था। आज 2026 में भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। ऐसे में 1947 के उस पहले इंडिपेंडेंस डे (Independence Day) को पीछे मुड़कर देखना बेहद दिलचस्प है। आइए जानते हैं पहले स्वतंत्रता दिवस से जुड़े 5 ऐसे फैक्ट्स, जो आज भी बहुत से लोगों को नहीं पता हैं...
हम हर साल देखते हैं कि 15 अगस्त को लाल किले पर झंडा फहराया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पहले स्वतंत्रता दिवस पर ऐसा नहीं हुआ था? 15 अगस्त 1947 को प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और लॉर्ड माउंटबेटन ने दिल्ली के प्रिंसेस पार्क (इंडिया गेट के पास) में यूनियन जैक (ब्रिटिश झंडा) को नीचे उतारा और पहली बार भारत का तिरंगा फहराया। लाल किले पर झंडा फहराने की परंपरा इसके अगले दिन यानी 16 अगस्त से शुरू हुई थी।
जिस दिन हमारा देश आजाद हुआ, उस दिन हमारा कोई ऑफिशियल राष्ट्रगान (National Anthem) ही नहीं था। 'जन गण मन' को 24 जनवरी 1950 में अपनाया गया। इसलिए पहले इंडिपेंडेंस डे से जुड़े कार्यक्रमों में आज जैसा राष्ट्रगान वाला प्रोटोकॉल नहीं था। 15 अगस्त 1947 की रात जब संसद में जश्न चल रहा था, तब पूरा कार्यक्रम 'वंदे मातरम' गाकर खत्म किया गया था।
भारत को आज़ादी दिन के उजाले में नहीं, बल्कि 14 और 15 अगस्त की आधी रात को मिली थी। जब पूरी दुनिया सो रही थी, तब संसद भवन में सत्ता का ट्रांसफर हो रहा था। इसी रात पंडित नेहरू ने अपना सबसे फेमस भाषण दिया था, जिसे दुनिया 'Tryst with Destiny' (नियति से साक्षात्कार) के नाम से जानती है। उन्होंने कहा था, 'आज एक ऐसा पल आया है, जो इतिहास में बहुत कम आता है, जब हम एक पुराने युग से निकलकर नए युग में कदम रख रहे हैं।'
15 अगस्त 1947 देश के लिए सबसे बड़ी खुशी का दिन था, लेकिन हर जगह माहौल एक जैसा नहीं था। आजादी के साथ ही भारत का बंटवारा हुआ और पाकिस्तान एक अलग देश बना। इसके बाद बड़े पैमाने पर लोगों को अपना घर छोड़कर दूसरी जगह जाना पड़ा। कई इलाकों में सांप्रदायिक हिंसा का माहौल था। इसलिए 1947 का इंडिपेंडेंस डे सिर्फ मिठाई बांटने और जश्न मनाने की कहानी नहीं है। एक तरफ लोग आजादी का स्वागत कर रहे थे, तो दूसरी तरफ हजारों-लाखों परिवार बंटवारे के दर्द से गुजर रहे थे।
जब दिल्ली में आजादी का जश्न चल रहा था, तब महात्मा गांधी वहां समारोह में शामिल नहीं थे। उस समय वह बंगाल में थे और सांप्रदायिक तनाव के बीच शांति कायम करने की कोशिश कर रहे थे। देश के अलग-अलग हिस्सों में बंटवारे के कारण हालात मुश्किल थे और गांधी लोगों के बीच शांति का संदेश पहुंचाने में लगे थे। यानी जिस दिन पूरा देश आजादी का जश्न मना रहा था, गांधी उस समय उन लोगों के बीच थे, जो हिंसा और तनाव से परेशान थे।
सोर्स नोट: इस आर्टिकल में दी गई ऐतिहासिक जानकारी Time Magazine, First Post, Indian Express और Nehru Memorial Museum and Library (NMML) के ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स और रिपोर्ट्स पर आधारित है।