
Laddu Gopal Buying Tips: आज 4 सितंबर को पूरे देश में जन्माष्टमी की जबरदस्त धूम है। मथुरा-वृंदावन से लेकर द्वारका और जगन्नाथ पुरी तक मंदिरों में कान्हा के जन्मोत्सव की रौनक देखते ही बन रही है। दिनभर अष्टमी तिथि है, ऐसे में पूजा की तैयारियां सुबह से ही शुरू हो चुकी हैं। वैसे तो कन्हैया का जन्म मध्यरात्रि के आठवें मुहूर्त में माना जाता है। इस मौके पर कई लोग अपने घर नए लड्डू गोपाल लाते हैं। अब जमाना ऑनलाइन शॉपिंग का है, तो ज्यादातर लोग फोन पर ही मूर्ति ऑर्डर कर रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि स्क्रीन पर चमकने वाली पीतल (Brass) या अष्टधातु की मूर्ति कई बार सिर्फ चमकता हुआ सस्ता प्लास्टिक, रेजिन या मिलावटी लोहा निकलती है? भगवान की सेवा पूरे भाव से की जाती है, इसलिए ठगी से बचना जरूरी है। अगर आप भी ई-कॉमर्स साइट्स या सोशल मीडिया से बाल गोपाल मंगवा रहे हैं, तो पार्सल खोलते ही इन 8 आसान तरीकों से चेक कर लें कि मूर्ति असली धातु की है या नकली...
असली पीतल, तांबे या कांसे की मूर्ति अपने साइज के मुकाबले काफी भारी होती है। अगर 3 से 4 इंच के लड्डू गोपाल का वजन हाथ में लेने पर किसी हल्के खिलौने जैसा लगे, तो समझ लीजिए अंदर से मूर्ति खोखली है या फिर रेजिन/फाइबर पर सिर्फ मेटल का पतला पेंट चढ़ाया गया है। असली सॉलिड मेटल हाथ में लेते ही वजनदार महसूस होता है।
यह सबसे तेज और अचूक नुस्खा माना जाता है। घर का कोई भी सामान्य चुंबक मूर्ति पर लगाकर देखें। पीतल, तांबा, अष्टधातु या कांसा कभी भी चुंबक पर नहीं चिपकते। अगर चुंबक मूर्ति से चिपक गया, तो इसका सीधा मतलब है कि अंदर सस्ता लोहा या मिलावटी धातु भरी गई है।
ऑनलाइन फ्रॉड में अक्सर सफेद मेटल या फाइबर के ऊपर गोल्डन स्प्रे पेंट मार दिया जाता है। मूर्ति के नीचे (बेस) की तरफ किसी सिक्के या चाबी से हल्का सा रगड़ें। अगर ऊपर की सुनहरी परत हटने के बाद नीचे सफेद, स्लेटी या काला रंग दिखने लगे, तो वह नकली है। असली पीतल रगड़ने पर भी अंदर से गहरा पीला या सुनहरा ही निकलेगा।
हाथ से ढली और तराशी गई मूर्ति में एक जीवंतता होती है। मशीनी प्लास्टिक या डाई से बनी नकली मूर्तियों के नैन-नक्श अक्सर सपाट या टेढ़े-मेढ़े होते हैं। कान्हा के घुंघराले बाल, आंखें, मोरपंख की जगह और चेहरे की मुस्कान बिल्कुल साफ और बारीक तराशी होनी चाहिए। अगर चेहरे पर शार्पनेस नहीं है, तो कारीगरी दोयम दर्जे की है।
लड्डू गोपाल की रोजाना सेवा में स्नान सबसे मुख्य होता है। मूर्ति पर हल्का सा पानी या गंगाजल लगाएं और साफ सूती कपड़े से पोछें। अगर कपड़े पर पीला या काला रंग छूटने लगे, तो वह केमिकल वार्निश या पेंट है, जो पूजा और अभिषेक के लायक बिल्कुल नहीं है।
धातु की अपनी एक तासीर होती है। जब आप असली धातु की मूर्ति को छुएंगे, तो शुरुआत में वह आपको ठंडी लगेगी और कमरे के तापमान के हिसाब से धीरे-धीरे सामान्य होगी। वहीं रेजिन, मिट्टी या प्लास्टिक की बनी मूर्ति छूने पर सामान्य या हल्की गर्म प्लास्टिक जैसी ही लगती है।
ऑनलाइन सामान खरीदते वक्त स्टार रेटिंग के झांसे में न आएं। प्रोडक्ट पेज पर जाकर 'Customer Images' वाला सेक्शन खोलें। वहां देखें कि असली बायर्स के घर पर जो पार्सल पहुंचा है, उसकी फिनिशिंग वैसी ही है जैसी सेलर ने फोटो में दिखाई थी? कई बार सेलर जयपुर या मथुरा के कारीगरों की फोटो लगा देते हैं और डिलीवरी में सस्ती लोकल मूर्ति भेजते हैं।
धातु की चीजें खरीदते समय कभी भी 'No Return' वाले सेलर से न खरीदें। ऑर्डर करते समय यह पक्का करें कि कम से कम 7 दिन की रिप्लेसमेंट या रिटर्न विंडो खुली हो। पार्सल आते ही अनबॉक्सिंग का छोटा सा वीडियो जरूर बना लें, ताकि अगर मूर्ति टूटी या नकली निकले, तो तुरंत रिफंड क्लेम किया जा सके।