
Krishna Janmashtami Special: 4 सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। देशभर में इस पावन पर्व की धूम है। घर-घर में माखन-मिश्री का भोग लगाने, लड्डू गोपाल का झूला सजाने और कान्हा के स्वागत की तैयारियां जोरों पर हैं। हम सब उन्हें प्यार से कान्हा, गोविंद, गोपाल, मुरलीधर या माखनचोर कहकर पुकारते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस नटखट बालक को आज पूरी दुनिया 'श्रीकृष्ण' कहती है, उनका असली नाम 'कृष्ण' ही कैसे पड़ा? जन्म के वक्त मथुरा के कारागार में माता देवकी और वासुदेव ने उनका क्या नाम रखा था और किसने पहली बार उन्हें इस नाम से पुकारा था? आइए इस पावन मौके पर जानते हैं इसके पीछे की कहानी...
भाद्रपद महीने की अंधेरी रात में जब मथुरा की जेल में कान्हा का जन्म हुआ, तब चारों तरफ कंस का खौफ था। पहरेदार सो रहे थे और वासुदेव जी को उस नवजात शिशु को तुरंत गोकुल में नंदबाबा के घर पहुंचाना था। श्रीमद्भागवत महापुराण के 10वें स्कंध में आता है कि 'जेल में प्राण बचाने की इतनी जल्दबाजी और तनाव था कि उस वक्त कोई पारंपरिक नामकरण संस्कार हो ही नहीं सका। वासुदेव जी बस बालक को टोकरी में रखकर गोकुल छोड़ आए। इसलिए जन्म के तुरंत बाद उनका कोई औपचारिक नाम दर्ज नहीं हुआ।' गोकुल के लोग और माता यशोदा उन्हें शुरुआत में सिर्फ लाला, कान्हा या नंदलाल कहकर ही दुलारते थे।
जब कन्हैया थोड़े बड़े हुए, तब यदुवंशियों के कुलगुरु महर्षि गर्गाचार्य (गर्ग मुनि) को चुपचाप गोकुल बुलाया गया। कंस को भनक न लगे, इसलिए नंदबाबा ने कोई बड़ा उत्सव करने के बजाय घर की गौशाला में बिल्कुल सादगी से नामकरण संस्कार करवाया। गर्ग संहिता और श्रीमद्भागवत पुराण (10.8.13) के अनुसार, महर्षि गर्गाचार्य ने उस नवजात बालक के तेज और उसके सांवले रंग को ध्यान से देखा। उन्होंने नंदबाबा और यशोदा से कहा कि इस बालक ने पूर्व के युगों में सफेद, लाल और पीले रंग के शरीर धारण किए थे, लेकिन इस बार ये गहरे मेघ (काले-सांवले बादलों) जैसे रंग में आया है। इसलिए इसका सबसे प्रधान और अलौकिक नाम 'कृष्ण' होगा।
ऋषि गर्ग ने ये नाम सिर्फ रंग देखकर नहीं चुना था, बल्कि इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक कारण था। महाभारत के उद्योग पर्व (68.5) में महर्षि वेदव्यास ने 'कृष्ण' शब्द की बड़ी सुंदर व्याख्या की है। संस्कृत व्याकरण के अनुसार 'कृष्ण' शब्द दो अक्षरों के मेल से बनता है, 'कृष' और 'ण'। 'कृष' का अर्थ होता है आकर्षण यानी जो अपनी तरफ सबको खींच ले या जो सत्ता का आधार हो। वहीं 'ण' का अर्थ होता है आनंद या परमानंद। यानी जो पूरे ब्रह्मांड को अपने आनंद और प्रेम से अपनी ओर खींच ले, उसी परम तत्व को 'कृष्ण' कहा जाता है। ऋषि गर्ग जानते थे कि ये बालक आगे चलकर पूरी सृष्टि को अपनी ओर आकर्षित करेगा।
उसी नामकरण संस्कार के दौरान गर्ग मुनि ने ये भी भविष्यवाणी की थी कि चूंकि ये बालक वासुदेव के पुत्र के रूप में प्रकट हुआ है, इसलिए ज्ञानी और विद्वान लोग इसे भविष्य में 'वासुदेव' के नाम से भी जानेंगे। जैसे-जैसे कान्हा बड़े हुए और अपनी बाल-लीलाएं दिखाईं, भक्तों ने उन्हें अनगिनत नाम दे दिए। गोकुल में माखन की मटकी फोड़ी तो 'माखनचोर' कहलाए, गायों को चराया तो 'गोपाल' और 'गोविंद' बने, सिर पर मोरपंख और होठों पर मुरली सजाई तो 'मुरलीधर' कहलाए और जब कंस व असुरों का संहार कर धर्म की स्थापना की तो 'द्वारकाधीश' बने। लेकिन ऋषि गर्ग का दिया हुआ 'कृष्ण' नाम ही उनकी सबसे बड़ी और अमर पहचान बना।
शास्त्रों में मान्यता है कि 'कृष्ण' सिर्फ किसी व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक सिद्ध महामंत्र है। जब भी कोई इंसान सच्चे मन से इस नाम का उच्चारण करता है, उसके मन का सारा भारीपन और बेचैनी अपने आप शांत हो जाती है।