
Kanwar Yatra Significance: हर साल सावन का महीना आते ही देशभर में लाखों शिवभक्त कांवड़ यात्रा पर निकलते हैं। कोई सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलता है तो कोई हजारों किलोमीटर की यात्रा पूरी करता है। इस दौरान आपने देखी होगी कि ज्यादातर कांवड़िए नंगे पैर ही चलते हैं। सवाल उठता है आखिर ऐसा क्यों? क्या यह सिर्फ एक परंपरा है या इसके पीछे कोई धार्मिक और आध्यात्मिक कारण भी छिपा है? आइए जानते हैं कांवड़ यात्रा में नंगे पैर चलने का क्या महत्व है।
हिंदू धर्म में कांवड़ यात्रा को भगवान शिव की कठिन तपस्या और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। नंगे पैर चलना इस बात का संकेत है कि भक्त अपने आराम और सुख-सुविधा का त्याग कर पूरी श्रद्धा से भोलेनाथ की सेवा कर रहा है। जिस तरह मंदिर में प्रवेश से पहले जूते-चप्पल उतारे जाते हैं, उसी भावना को कई श्रद्धालु पूरी यात्रा के दौरान अपनाते हैं।
मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला, तब भगवान शिव ने पूरी सृष्टि की रक्षा के लिए उसे पी लिया। इसके बाद उनके शरीर की गर्मी शांत करने के लिए देवताओं ने अलग-अलग पवित्र नदियों का जल उनके ऊपर चढ़ाया। इसी घटना को कांवड़ यात्रा की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। श्रद्धालु गंगा या अन्य पवित्र नदियों से जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। इस यात्रा के दौरान कठिनाई सहना और नंगे पैर चलना भगवान शिव के प्रति तप, त्याग और श्रद्धा का प्रतीक है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नंगे पैर चलने से व्यक्ति का अहंकार कम होता है। यात्रा के दौरान भक्त जमीन से सीधे जुड़ता है, जिससे उसके अंदर विनम्रता और धैर्य का भाव बढ़ता है। कठिन यात्रा मन को अनुशासित करती है और भगवान के प्रति आस्था को मजबूत बनाती है।
हालांकि कांवड़ यात्रा मुख्य रूप से धार्मिक आस्था से जुड़ी है, लेकिन कुछ एक्सपर्ट नंगे पैर चलने को ग्राउंडिंग (Grounding या Earthing) से भी जोड़ते हैं। कुछ रिसर्च के मुताबिक, जमीन पर कुछ समय तक नंगे पैर चलने से तनाव कम होने और शांति महसूस होती है।
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नहीं। जरूरी नहीं है कि हर कांवड़िए को नंगे पैर ही चलना होगा। कई श्रद्धालु अपनी हेल्थ, उम्र या अन्य कारणों से चप्पल या जूते पहनकर भी यात्रा करते हैं। सबसे जरूरी चीज श्रद्धा, नियमों का पालन और भगवान शिव के प्रति सच्ची भक्ति मानी जाती है।
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कॉन्टेन्ट सोर्सः शिव पुराण, स्कंद पुराण, भारतीय पुरातत्व एवं संस्कृति पर प्रकाशित धार्मिक अध्ययन, Ministry of Culture, Government of India, विभिन्न अखाड़ों एवं धार्मिक विद्वानों की पारंपरिक व्याख्याएं