
Shri Krishna Janmashtami Special Story: 4 सितंबर 2026 को कृष्ण जन्माष्टमी है। देशभर में कान्हा का जन्मोत्सव मनाया जा रहा है। मंदिरों में झांकियां सजी हैं, घरों में लड्डू गोपाल का श्रृंगार हो रहा है और सोशल मीडिया पर श्रीकृष्ण की तस्वीरें खूब शेयर की जा रही हैं। हमने ज्यादातर तस्वीरों और टीवी सीरियल्स में कृष्ण को नीले रंग में देखा है। दूसरी तरफ शास्त्रों में उनके लिए 'कृष्ण', 'श्याम' और 'मेघवर्ण' (बादल जैसे गहरे रंग) की बातें मिलती हैं। तो आखिर श्रीकृष्ण का असली रंग क्या था? उनका रंग नीला था या काला? शास्त्रों में उनके रंग का कैसा वर्णन मिलता है और फिर कृष्ण की तस्वीरों में उन्हें नीले रंग का क्यों दिखाया जाता है? आइए जानते हैं इन सवालों का जवाब...
श्रीकृष्ण के नाम को लेकर सबसे खास बात यह है कि भागवत पुराण में उनके नामकरण के प्रसंग में ही उनके रंग का जिक्र आता है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में गोकुल में नामकरण के दौरान गर्ग मुनि नंद बाबा को बताते हैं कि यह बालक अलग-अलग युगों में अलग-अलग रंगों में प्रकट हुआ है। वहां सफेद, लाल और पीले रंग का जिक्र करने के बाद कहा गया है कि अब उन्होंने 'कृष्णतां' यानी काले या श्याम रंग को धारण किया है। दशम स्कंध, अध्याय 3 के श्लोक 9-10 में कृष्ण के शरीर के लिए 'सांद्र-पयोद-सौभगम्' शब्द आता है। इसके अर्थ में घने बादल जैसी काली या गहरी आभा का वर्णन किया गया है। उसी वर्णन में उनके पीले वस्त्र और चार हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म का भी उल्लेख मिलता है।
श्रीमद्भागवत के एक दूसरे प्रसंग में कृष्ण के शरीर की तुलना नीले कमल की पंखुड़ियों से की गई है। श्लोक में शब्द आता है, 'नीलोत्पल-दल-श्यामम्।' इसका भाव है कि भगवान का शरीर नीले कमल की पंखुड़ियों जैसा श्याम या गहरा दिखाई देता है। इसीलिए कृष्ण के नीले रंग से जोड़ा जाता है।
'मेघ' यानी बादल और 'वर्ण' यानी रंग या आभा। संस्कृत शब्दकोशों में मेघवर्ण का अर्थ टबादल के रंग वालाट (Cloud-Coloured) दिया गया है। जब सावन-भादों में आसमान में पानी से भरे भारी बादल उमड़ते हैं, तो उनका रंग नीला नहीं, बल्कि गहरा सलेटी या काला दिखता है, जिस पर हल्की चमक होती है। शास्त्रों के अनुसार, भगवान का रंग बिल्कुल वैसा ही चमकदार गहरा सांवला था। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत में द्रौपदी और कृष्ण दोनों के सांवले होने का जिक्र किया है। इसीलिए द्रौपदी का एक नाम 'कृष्णा' भी था।
कृष्ण के रंग को समझने के लिए एक और प्रसिद्ध संदर्भ ब्रह्म संहिता 5.30 का है। इसमें कृष्ण के सुंदर रूप की तुलना नीले बादल की आभा से की गई है। इसमें उनकी बांसुरी और मोरपंख का भी वर्णन मिलता है। यहां इस्तेमाल हुआ शब्द है 'असिताम्बुद' का भाव गहरे या नीले बादल की ओर जाता है।
अनंतता का प्रतीक
भारतीय दर्शन में जो भी चीज असीम यानी जिसका कोई अंत न हो और विशाल है, उसे नीले रंग से दर्शाया जाता है। आसमान अनंत है, नीला दिखता है। महासागर अथाह है, नीला दिखता है। कृष्ण का व्यक्तित्व और उनका विराट रूप भी अनंत था, इसलिए कलाकारों ने उन्हें प्रतीकात्मक रूप से नीला रंग दिया।
विष वाली पौराणिक मान्यता
कुछ कथाओं जैसे कालिया नाग दमन में कहा जाता है कि यमुना में कालिया नाग के भयंकर जहर के संपर्क में आने से उनका रंग नीला पड़ गया था। हालांकि, यह एक लोककथा है, मुख्य शास्त्रीय आधार बादलों का सांवलापन ही है।
राजा रवि वर्मा और आधुनिक पेंटिंग्स
19वीं-20वीं सदी में जब कैलेंडर आर्ट की शुरुआत हुई, तो विख्यात चित्रकार राजा रवि वर्मा और उस दौर के कलाकारों ने देवी-देवताओं के चित्र कैनवास पर उतारे। कैनवास पर शुद्ध 'काला' रंग उभारने से चेहरे के नैन-नक्श और भाव छिप जाते थे। रंगों के संतुलन और दिव्यता (Aura) दिखाने के लिए उन्होंने 'नीले-बैंगनी' शेड का इस्तेमाल किया, जो आंखों को बहुत भाया और धीरे-धीरे यही हमारी सोच में बस गया।