
Gandak River History: नेपाल में बुधवार को आए फ्लैश फ्लड के बाद बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में जिस नदी को लेकर सबसे ज्यादा हलचल रही, वह है गंडक नदी। तिब्बत और नेपाल के पहाड़ों से निकली यह वही नदी है, जिसे नेपाल में लोग 'नारायणी' और 'सप्तगंडकी' कहकर पूजते हैं, लेकिन भारत की सीमा में दाखिल होते ही इसका नाम 'गंडक' हो जाता है। यह केवल एक नदी नहीं, बल्कि आस्था और भूगोल का एक ऐसा संगम है, जिसका संबंध भगवान विष्णु के साक्षात रूप 'शालिग्राम' से है। आइए जानते हैं कि एक ही नदी के दो देशों में अलग-अलग नाम क्यों हैं और इसमें शालिग्राम मिलने का वैज्ञानिक और पौराणिक रहस्य क्या है...
गंडक नदी का सफर बेहद दिलचस्प है। यह तिब्बत और नेपाल के बर्फीले हिमालय से शुरू होती है और करीब 630 किलोमीटर का सफर तय करके बिहार के सोनपुर (हाजीपुर) में गंगा नदी में समा जाती है। नेपाल सरकार के 'River Basin Atlas' के मुताबिक, गंडकी नदी तंत्र को नेपाल में सप्तगंडकी (Sapta Gandaki) यानी सात प्रमुख धाराओं की व्यवस्था के रूप में भी जाना जाता है। हिमालय की सात अलग-अलग पहाड़ी नदियां (त्रिशूली, बूढ़ी गंडकी, मर्स्यांग्दी, सेती गंडकी, दरौंदी, मादी और काली गंडकी) जब आपस में मिलती हैं, तो इसे 'सप्तगंडकी' कहा जाता है। मध्य नेपाल के चितवन और देवघाट में जब यह विशाल रूप लेती है, तो इसे भगवान नारायण (विष्णु) के नाम पर नारायणी कहा जाता है।
जब यह नदी बिहार के पश्चिमी चंपारण के वाल्मीकिनगर से भारत में प्रवेश करती है, तो इसे गंडक कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, गंडक ऋषि के कठोर तप के कारण इस नदी का नाम गंडक पड़ा। संस्कृत साहित्य और महाभारत में इसे 'सदानीरा' (जिसमें हमेशा जल भरा रहे) भी कहा गया है।
काली गंडकी खुद गंडकी नदी तंत्र की एक प्रमुख धारा है, जबकि नारायणी उस बड़े नदी तंत्र का आगे का नाम है, जो देवघाट में काली गंडकी और त्रिशूली के मिलने के बाद इस्तेमाल होता है। नेपाल सरकार के दस्तावेज के मुताबिक, काली गंडकी का सोर्स मस्टैंग क्षेत्र में नुबाइन हिमाल ग्लेशियर (Nhubine Himal Glacier) के पास है। इसके बाद नदी दक्षिण की ओर बहती हुई देवघाट पहुंचती है, जहां इसका त्रिशूली से संगम होता है और इसके बाद नदी को नारायणी कहा जाता है। यही वजह है कि अलग-अलग जगहों पर आपको काली गंडकी, गंडकी, नारायणी और गंडक जैसे नाम दिखाई देते हैं। ये अलग-अलग नदियां नहीं हैं, बल्कि एक ही बड़े नदी तंत्र की अलग धाराओं और हिस्सों के नाम हैं।
हिंदू धर्म में शालिग्राम को भगवान विष्णु का प्रत्यक्ष विग्रह माना जाता है। पूरे विश्व में शालिग्राम पत्थर सिर्फ इसी नदी घाटी (विशेषकर नेपाल के मुक्तिनाथ क्षेत्र से निकलने वाली काली गंडकी) के तल में पाए जाते हैं। स्कंद पुराण और श्रीमद्भागवत के अनुसार, देवी तुलसी (वृंदा) के शाप और भगवान विष्णु के वरदान के कारण श्रीहरि ने इस नदी में पाषाण (शालिग्राम शिला) के रूप में निवास करना स्वीकार किया था। अयोध्या में बने भव्य श्रीराम मंदिर में भगवान रामलला की मूर्ति निर्माण और पूजन के लिए भी नेपाल की इसी गंडकी नदी से 6 करोड़ साल पुरानी दो विशाल देवशिलाएं (शालिग्राम) लाई गई थीं।
भूवैज्ञानिकों (Geologists) के अनुसार, जहां आज हिमालय खड़ा है, वहां करोड़ों साल पहले टेथिस सागर (Tethys Ocean) लहराता था। जब धरती की टेक्टोनिक प्लेट्स आपस में टकराईं और हिमालय का निर्माण हुआ, तो समुद्र के तल में रहने वाले 'अमोनाइट' (Ammonite) नाम के समुद्री जीवों के जीवाश्म (Fossils) इन पत्थरों में कैद हो गए। नदी के तेज बहाव और घर्षण से जब ये पत्थर गोल और चिकने होते हैं, तो उनके अंदर जीवाश्म के प्राकृतिक चक्र उभर आते हैं, जिन्हें हम भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के रूप में पूजते हैं। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस (Cambridge University Press) में पब्लिश 'Holly Walters' के रिसर्च के अनुसार, शालिग्राम की पूजा की परंपरा लंबे समय से दक्षिण एशिया में चली आ रही है और इन पवित्र जीवाश्मों का मूल क्षेत्र नेपाल की मस्टैंग (Mustang) स्थित काली गंडकी रिवर वैली (Kali Gandaki River Valley) है।
तिब्बत बॉर्डर पर ल्हेंदे नदी में पहाड़ खिसकने से आए मलबे और सैलाब ने नेपाल की भोटेकोशी और त्रिशूली नदी को उफान पर ला दिया था। त्रिशूली का यह सारा पानी नारायणी नदी में आया। चूंकि नेपाल के चितवन और तराई के विशाल मैदानी इलाकों में नारायणी नदी का पाट काफी चौड़ा है, इसलिए पानी का बड़ा हिस्सा वहां फैल गया। जब यह पानी भारत सीमा पर वाल्मीकिनगर बैराज पहुंचा, तो डिस्चार्ज करीब 1.5 लाख क्यूसेक तक गया, लेकिन जल्द ही घटकर सामान्य स्तर पर आ गया। इससे बिहार (चंपारण, गोपालगंज, सारण) और यूपी (कुशीनगर, महाराजगंज) में आने वाला बड़ा खतरा समय रहते टल गया।