
Why Tie Rakhi To Trees: रक्षा बंधन का नाम सुनते ही आमतौर पर भाई की कलाई पर बंधी राखी और बहन के प्यार की तस्वीर सामने आती है। लेकिन देश के कई हिस्सों में इस त्योहार को प्रकृति से जोड़ने की एक अनोखी परंपरा भी है। यहां लोग पेड़ों को राखी बांधते हैं और उनकी रक्षा का संकल्प लेते हैं। सवाल यह है- आखिर पेड़ को राखी बांधने की परंपरा शुरू कहां से हुई? क्या इसका जिक्र किसी प्राचीन ग्रंथ में मिलता है या यह पर्यावरण संरक्षण से जुड़ी कोई पहल है? पेड़ों को राखी बांधना रक्षाबंधन की कोई धार्मिक रस्म नहीं है। यह प्रकृति की रक्षा का सोशल मैसेज है। झारखंड के आदिवासी इलाकों से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार और राजस्थान जैसे राज्यों में यह परंपरा देखने को मिलती है।
रक्षाबंधन में राखी को रक्षा के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। बहन भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती है और भाई उसकी रक्षा का संकल्प लेता है। इसी थॉट को बाद में प्रकृति तक बढ़ाया गया। सोच यह बनी कि जब पेड़ हमारे जीवन के लिए इतने जरूरी हैं, तो उनकी रक्षा का संकल्प भी लिया जाना चाहिए। इसीलिए पेड़ के तने पर राखी बांधना ‘वृक्ष रक्षा’ का प्रतीक बन गया।
पेड़ों को राखी बांधने की एक परंपरा झारखंड के आदिवासी इलाकों में है। एक ‘Taru Bandhan’ या ‘Vriksh Raksha Bandhan’ का जिक्र मिलता है। इसमें हजारीबाग के दुधमटिया गांव के टीचर महादेव महतो ने इस पहल को आगे बढ़ाया। हजारीबाग का दुधमटिया जंगल पेड़ों को राखी बांधने की परंपरा के लिए खास तौर पर जाना जाता है। झारखंड वन विभाग के अनुसार, यहां 7 अक्टूबर 1995 से ‘वृक्ष रक्षा बंधन’ की पहल जुड़ी है। हर साल लोग पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधकर जंगल की रक्षा का संकल्प लेते हैं। विभाग के अनुसार, इस परंपरा के बाद करीब 52 जंगलों को संरक्षण से जोड़ा गया है। झारखंड के पूर्वी सिंहभूम के चाकुलिया और सुनसुनिया जंगल में भी रक्षाबंधन पर महिलाएं साल के पेड़ों को राखी बांधती हैं। इसके साथ ही, गिरिडीह, कोडरमा, गुमला, सरायकेला-खरसावां, लोहरदगा, चतरा, रांची, रामगढ़, खूंटी, हजारीबाग, सिमडेगा और लातेहार जैसे जिलों में भी ‘वन रक्षा बंधन’ कार्यक्रम होता है।
राजस्थान के राजसमंद जिले का पिपलांत्री गांव भी पेड़ों और रक्षाबंधन से जुड़ी अनोखी मिसाल के लिए चर्चा में रहा है। यहां बेटियां पेड़ों को भाई मानकर राखी बांधती हैं और उनकी देखभाल का संकल्प लेती हैं। इस पहल का संबंध गांव में बेटियों के जन्म पर पौधे लगाने और पर्यावरण संरक्षण की मुहिम से है। यहां राखी सिर्फ एक त्योहार की रस्म नहीं रह जाती, बल्कि बेटी-पेड़ और प्रकृति के बीच रिश्ते का प्रतीक भी है।
बिहार में भी रक्षाबंधन को पेड़ों की सुरक्षा से जोड़ने की पहल हुई। 13 अगस्त 2012 को ‘बिहार वृक्ष सुरक्षा दिवस’ की शुरुआत की गई। इसके बाद रक्षाबंधन के अवसर पर पेड़ों को रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा को बढ़ावा दिया गया।
पेड़ को राखी बांधने का मतलब यह नहीं है कि पेड़ सचमुच इंसान की तरह राखी बांधने की धार्मिक रस्म निभा रहा है। यह एक प्रतीकात्मक संकल्प है। पेड़ हमें ऑक्सीजन, छाया, फल, लकड़ी और अनेक जीवों को रहने की जगह देते हैं। इसलिए उनके प्रति जिम्मेदारी निभाने का संकल्प इस रस्म में छिपा है। 2017 में झारखंड और उत्तर प्रदेश में भी लोगों और स्कूली बच्चों ने पेड़ों को राखी बांधकर उन्हें बचाने का संकल्प लिया था।