
Tulsi Mala Rules: सनातन धर्म में तुलसी को केवल एक पौधा नहीं, बल्कि मां तुलसी का स्वरूप माना गया है। तुलसी भगवान विष्णु को सबसे ज्यादा प्रिय हैं। यही वजह है वैष्णव परंपरा में तुलसी की माला का खास महत्व बताया गया है। सवाल है क्या तुलसी की माला हर कोई पहन सकता है? क्या इसके लिए कोई खास नियम हैं? आइए जानते हैं।
धर्मग्रंथों के अनुसार- तुलसी भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और श्रीराम की प्रिय हैं। इसलिए तुलसी की लकड़ी से बनी माला को धारण करना भगवान के प्रति श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। वैष्णव संप्रदाय के संत और भक्त अक्सर गले में तुलसी की माला पहनते हैं। इसे भगवान की शरण और सही कामों की याद दिलाने वाला धार्मिक चिह्न भी माना जाता है।
तुलसी की माला पहनने पर किसी जाति, उम्र या लिंग का बंधन नहीं है।
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1. साफ मन के साथ तुलसी की माला पहनें
तुलसी की माला सिर्फ आभूषण नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था का प्रतीक भी है। इसलिए इसे फैशन के लिए नहीं, बल्कि श्रद्धा से पहनना चाहिए।
2. साफ-सफाई का ध्यान रखें
माला पहनने वाला व्यक्ति अपने आचरण और स्वच्छता का ध्यान रखे। यह धार्मिक अनुशासन का हिस्सा माना जाता है।
3. भगवान को याद करें
कई वैष्णव परंपराओं में तुलसी की माला पहनते समय भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का नाम लेना चाहिए।
हां। महिलाएं भी तुलसी की माला पहन सकती हैं। कई मंदिरों और वैष्णव परंपराओं में महिलाएं रेगुलर रूप से तुलसी की माला पहनती हैं।
अलग-अलग नियम हैं। कई वैष्णव संप्रदाय इसे हमेशा पहनने की सलाह देते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में विशेष परिस्थितियों में इसे उतारने की बात कही जाती है।
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1. वृंदा और भगवान विष्णु की कथा
यह कथा पद्म पुराण, स्कंद पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में अलग-अलग रूपों में मिलती है। कथा के अनुसार, वृंदा दैत्यराज जलंधर की पतिव्रता पत्नी थीं। उनके सतीत्व के प्रभाव से जलंधर को कोई देवता हरा नहीं कर पा रहा था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण कर वृंदा की तपस्या भंग कर दी। इससे जलंधर की शक्ति समाप्त हो गई और भगवान शिव ने उसका वध कर दिया।
सच जानने पर वृंदा ने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वे पत्थर बन जाएंगे। इसी शाप से शालिग्राम स्वरूप प्रकट हुआ। बाद में वृंदा ने देह त्याग दी और उनके तप से तुलसी का पौधा उत्पन्न हुआ। इसी कारण तुलसी को भगवान विष्णु की सबसे प्रिय माना जाता है।
2. तुलसी विवाह की कथा
वृंदा की कथा से ही तुलसी विवाह की परंपरा जुड़ी है। मान्यता है भगवान विष्णु ने वृंदा को वरदान दिया कि वे तुलसी के रूप में सदा पूजनीय रहेंगी और बिना तुलसी के उनकी पूजा अधूरी मानी जाएगी। हर साल कार्तिक शुक्ल एकादशी (देवउठनी एकादशी) से तुलसी-शालिग्राम विवाह कराया जाता है। इसके बाद हिंदू धर्म में विवाह जैसे मांगलिक कार्य शुरू होते हैं।
3. समुद्र मंथन से जुड़ी मान्यता
समुद्र मंथन के समय निकले दिव्य तत्वों में तुलसी को भी विशेष स्थान मिला। तुलसी में देवी लक्ष्मी का अंश माना जाता है, इसलिए जहां तुलसी होती है, वहां सुख-समृद्धि और पॉजिटिविटा का निवास होता है।
4. भगवान कृष्ण और तुलसी दल की कथा
वैष्णव परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा है- एक बार भगवान श्रीकृष्ण को सोने-चांदी और रत्नों से तौला गया, लेकिन पलड़ा बराबर नहीं हुआ। तब रुक्मिणी ने श्रद्धा से सिर्फ एक तुलसी दल भगवान को चढ़ाया। उसी वक्त तराजू बराबार हो गया।
5. यमराज और तुलसी की मान्यता
एक और मान्यता है कि जिस घर में हर दिन तुलसी की पूजा होती है, वहां नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं करतीं। तुलसी के पास दीपक जलाने और जल चढ़ाने से परिवार पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है।
6. तुलसी और भगवान विष्णु की पूजा
भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण और शालिग्राम की पूजा तुलसी दल के बिना अधूरी मानी जाती है। इसी वजह से मंदिरों और घरों में भगवान को भोग लगाते समय तुलसी का पत्ता जरूर रखा जाता है।
7. तुलसी और घर की पवित्रता
भारतीय घरों में तुलसी लगाने की परंपरा है। तुलसी घर में पॉजिटिव वातावरण, शुद्धता और आध्यात्मिक एनर्जी का प्रतीक है। वहीं आयुर्वेद में भी तुलसी को औषधीय गुणों से भरपूर बताया गया है।