
Lunar Eclipse: रात के आसमान में चमकता हुआ चांद जब अचानक लाल, नारंगी या तांबे जैसा दिखाई देने लगे, तो यह नजारा किसी रहस्यमयी घटना से कम नहीं लगता। चंद्र ग्रहण के दौरान दिखने वाले इसी लाल चांद को आम बोलचाल में ‘Blood Moon’ कहा जाता है। लेकिन चांद का अपना रंग तो सफेद या हल्का पीला दिखाई देता है, फिर ग्रहण के समय वह लाल क्यों हो जाता है? इसका जवाब किसी रहस्य या चांद पर होने वाले बदलाव में नहीं, बल्कि सूर्य की रोशनी, पृथ्वी की छाया और हमारे वायुमंडल में छिपा है। खास तौर पर इसमें Rayleigh Scattering का बड़ा रोल होता है। आइए जानते हैं चंद्र ग्रहण के दौरान आखिर चांद तक लाल रोशनी पहुंचती कैसे है?
चंद्र ग्रहण तब होता है जब सूर्य, पृथ्वी और चांद लगभग एक सीधी रेखा में आ जाते हैं और पृथ्वी सूर्य और चांद के बीच होती है। इस स्थिति में पृथ्वी की छाया चांद पर पड़ती है। चंद्र ग्रहण के दौरान पृथ्वी की छाया के 2 मुख्य हिस्से समझे जा सकते हैं- Penumbra और Umbra। जब चांद पृथ्वी की गहरी छाया यानी Umbra में पूरी तरह प्रवेश कर जाता है, तो इसे पूर्ण चंद्र ग्रहण (Total Lunar Eclipse) कहा जाता है। इस समय चांद पर सीधी सूर्य का प्रकास लगभग पूरी तरह रुक जाती है। लेकिन अगर सीधी धूप रुक गई, तो चांद पूरी तरह काला क्यों नहीं हो जाता? यहीं से शुरू होता है Blood Moon का असली साइंस।
पृथ्वी का वायुमंडल पूरी तरह से सूर्य के प्रकाश को रोक नहीं देता। सूर्य की कुछ किरणें पृथ्वी के वायुमंडल से होकर गुजरती हैं। इस दौरान प्रकाश वायुमंडल के गैस अणुओं से टकराती है, बिखरती है और कुछ हिस्सा मुड़कर पृथ्वी की छाया के अंदर पहुंच जाता है। मतलब चांद तक पहुंचने वाला यह प्रकाश सीधे सूर्य से नहीं आती, बल्कि पृथ्वी के वायुमंडल से छनकर और मुड़कर आती है। NASA के मुताबिक, पूर्ण चंद्र ग्रहण के दौरान पृथ्वी के वायुमंडल के किनारों से गुजरने वाली सूर्य की रोशनी ही चांद की सतह को हल्का उजाला करती है।
सूर्य की रोशनी हमें सफेद दिखाई देती है, लेकिन वास्तव में उसमें अलग-अलग रंगों का प्रकाश शामिल होता है। इन रंगों की wavelength यानी तरंगदैर्ध्य अलग-अलग होती है। जब सूर्य का प्रकाश पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरती है, तो छोटी wavelength वाली नीली और बैंगनी रोशनी वायुमंडल के छोटे अणुओं से ज्यादा बिखरती है। दूसरी तरफ लाल और नारंगी रोशनी की wavelength ज्यादा लंबी होती है और वे कम बिखरती हैं। इस प्रोसेस को Rayleigh Scattering कहते हैं।
यही वजह है कि दिन में हमें आसमान नीला दिखाई देता है। और जब सूर्य क्षितिज के पास होता है, तो उसकी रोशनी को वायुमंडल में लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। नीली रोशनी ज्यादा बिखर जाती है और हमारी आंखों तक लाल-नारंगी रोशनी ज्यादा पहुंचती है। इसी कारण सूर्योदय और सूर्यास्त लाल-नारंगी दिखाई देते हैं। चंद्र ग्रहण में भी लगभग इसी तरह का प्रोसेस होता है।
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इसे समझते हैं - पूर्ण चंद्र ग्रहण के समय अगर आप चांद की सतह पर खड़े होते, तो पृथ्वी के चारों तरफ आपको एक चमकदार लाल घेरा दिखाई देता। दरअसल, उस समय पृथ्वी के अलग-अलग हिस्सों में हो रहे सूर्योदय और सूर्यास्त की लाल-नारंगी रोशनी वायुमंडल से छनकर चांद की तरफ पहुंच रही होती।
यानी Blood Moon को एक तरह से पृथ्वी के सभी सूर्योदय और सूर्यास्तों की मिली-जुली रोशनी से प्रकाशित चांद भी कहा जा सकता है। जब यह लाल-नारंगी रोशनी चांद की सतह से टकराती है और वहां से वापस हमारी आंखों तक पहुंचती है, तो हमें चांद लाल दिखाई देता है।
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यह भी इस घटना की दिलचस्प बात है। हर चंद्र ग्रहण में चांद का रंग बिल्कुल एक जैसा नहीं होता। कभी वह हल्का नारंगी दिखता है, कभी गहरा लाल, कभी तांबे जैसा और कभी भूरा-लाल।
इसका कारण पृथ्वी के वायुमंडल की उस समय की स्थिति है। वातावरण में मौजूद धूल, धुआं, बादल और अन्य कण रोशनी को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करते हैं। ज्वालामुखी से निकली राख या वातावरण में मौजूद ज्यादा धूल भी ग्रहण के दौरान चांद के रंग और चमक को बदल सकती है। इसलिए एक ग्रहण का Blood Moon चमकीला नारंगी दिख सकता है, जबकि दूसरे ग्रहण में वही चांद गहरे लाल या लगभग भूरे रंग का नजर आ सकता है।