
Bal Gopal Footprints: जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाने के लिए घरों को खास तरीके से सजाया जाता है। कहीं फूलों से सजावट होती है, कहीं कान्हा के लिए झूला तैयार किया जाता है और कहीं आधी रात को जन्मोत्सव के बाद बाल गोपाल का श्रृंगार किया जाता है। इन्हीं परंपराओं में एक बेहद सुंदर परंपरा है घर में कान्हा के छोटे-छोटे पैरों के निशान बनाना। आमतौर पर ये निशान मुख्य दरवाजे से पूजा स्थल या लड्डू गोपाल के झूले तक बनाए जाते हैं। इन चरण चिह्नों को भगवान के घर में पधारने का प्रतीक माना जाता है।
जन्माष्टमी भगवान कृष्ण के जन्म का पर्व है। इसलिए भक्त इस दिन केवल पूजा ही नहीं करते, बल्कि अपने घर को भी कान्हा के स्वागत के लिए सजाते हैं। नन्हे पैरों के निशान इसी स्वागत भाव को दर्शाते हैं। भक्तों की भावना होती है कि जन्माष्टमी की रात बाल गोपाल स्वयं छोटे-छोटे कदमों से उनके घर में प्रवेश कर रहे हैं। इसलिए पैरों के निशान घर के प्रवेश द्वार से अंदर की तरफ बनाए जाते हैं।
इन चरण चिह्नों को आमतौर पर मुख्य दरवाजे से शुरू करके पूजा घर, मंदिर या उस स्थान तक बनाया जाता है जहां लड्डू गोपाल को विराजमान किया जाता है। इसका धार्मिक भाव बहुत सिंपल है। जैसे कोई मेहमान घर में प्रवेश करके अपने स्थान तक पहुंचता है, वैसे ही भक्त कल्पना करता है कि नन्हे कान्हा उसके घर आए हैं और सीधे अपने झूले या पूजा स्थान तक जा रहे हैं।
भगवान कृष्ण का बाल स्वरूप भक्तों के बीच विशेष प्रिय है। जन्माष्टमी पर उन्हें बच्चे की तरह सजाया जाता है, झूले में बैठाया जाता है, भोग लगाया जाता है और लोरी सुनाई जाती है। नन्हे पैरों के निशान भी इसी वात्सल्य भाव से जुड़े हैं। जब भक्त फर्श पर छोटे-छोटे पैर बनाता है, तो उसके मन में यह भाव होता है कि वह भगवान को किसी दूर मंदिर में नहीं, बल्कि अपने घर के सदस्य और बालक के रूप में देख रहा है। यानी इन चरण चिह्नों में भगवान के प्रति प्रेम, अपनापन और श्रद्धा का भाव दिखाई देता है।
भगवान के चरणों को बहुत पवित्र माना जाता है। इसलिए कान्हा के चरण चिह्न बनाना उनके चरणों का स्मरण करने जैसा माना जाता है। जन्माष्टमी के अवसर पर इन्हें घर में बनाकर भक्त यह भावना व्यक्त करता है कि कृष्ण के चरण उसके घर में पड़े हैं। इसी वजह से इन निशानों को सुख, शांति और आनंद के आगमन का प्रतीक भी माना जाता है।