
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा दुनियाभर में प्रसिद्ध है। लेकिन कम लोग जानते हैं कि रथयात्रा शुरू होने से पहले भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा लगभग 15 दिन तक 'बीमार' क्यों हो जाते हैं। इस दौरान मंदिर में उनके दर्शन भी नहीं होते हैं। पहली नजर में यह परंपरा अजीब लगती है, लेकिन इसके पीछे गहरी धार्मिक मान्यता, प्राचीन परंपरा और भक्तों के साथ भगवान के संबंध का बहुत प्यारा मैसेज छिपा है।
ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर में स्नान पूर्णिमा का भव्य उत्सव होता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र को मंदिर के गर्भगृह से बाहर स्नान वेदी पर लाते हैं। वैदिक मंत्रों के बीच 108 पवित्र कलशों के जल से उनका महाअभिषेक (स्नान) होता है। इस दिव्य स्नान को देखने हजारों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।
मान्यता अनुसार, 108 कलशों के ठंडे जल से लगातार स्नान करने के बाद भगवान को बुखार आ जाता है। इसलिए उन्हें एक साधारण इंसान की तरह आराम की जरूरत होती है। यही मैसेज इस परंपरा के माध्यम से दिया जाता है कि भगवान अपने भक्तों के सुख-दुख और जीवन की हर भावना से जुड़े हैं। वे केवल देवता ही नहीं, बल्कि अपने भक्तों के बहुत करीब हैं।
स्नान पूर्णिमा के अगले दिन से भगवान को मंदिर के एक खास रूम में ले जाया जाता है। इस मौके को अनसर काल (Anasara Kala या Anavasara) कहते हैं। यह 15 दिन तक चलता है। इस बीच भक्तों के लिए भगवान के रेगुलर दर्शन बंद रहते हैं। 'अनसर' का मतलब है– सार्वजनिक दर्शन से दूर रहना।
धार्मिक परंपरा के अनुसार, भगवान का इलाज होता है। उन्हें खास आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों से बना टॉनिक-काढ़ा दिया जाता है। हल्का और पचने योग्य भोग चढ़ाया जाता है। सेवायत (मंदिर के पारंपरिक सेवक) भगवान की खास सेवा करते हैं। मंदिर में भगवान के आराम की सभी परंपराएं निभाई जाती हैं। मान्यता है इस दौरान भगवान पूरी तरह आराम करते हैं और धीरे-धीरे ठीक होते हैं।
जब पुरी मंदिर में भगवान के दर्शन बंद रहते हैं, तब श्रद्धालु अलारनाथ मंदिर (ब्राह्मगिरि, ओडिशा) में भगवान विष्णु के अलारनाथ स्वरूप के दर्शन करते हैं। मान्यता है- अनसर काल में भगवान जगन्नाथ अलारनाथ के रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इस दौरान वहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
लगभग 15 दिन बाद जब भगवान पूरी तरह फिट होते हैं, तब उन्हें नए कपड़ों और खास तरीके से सजाया जाता है। इसके बाद भक्तों को पहली बार उनके दर्शन कराए जाते हैं। इसे नवयौवन दर्शन या नेत्रोत्सव कहते हैं। 'नवयौवन' का मतलब है– नई ऊर्जा, नई चमक-तेज और नई अवस्था से भरपूर स्वरूप। मान्यता है कि बीमारी से उबरने के बाद भगवान पहले से अधिक तेजस्वी और मन को मोह लेने वाले दिखाई देते हैं। यही दर्शन रथयात्रा से ठीक पहले होते हैं और इन्हें शुभ माना जाता है।
कॉन्टेन्स सोर्सः स्कंद पुराण (उत्कल खंड), ब्रह्म पुराण, श्री जगन्नाथ मंदिर प्रशासन पुरी, जगन्नाथ संस्कृति पर ओडिशा सरकार के प्रकाशन (Odisha Review), अलारनाथ मंदिर (ब्रह्मगिरि) की पारंपरिक मान्यताओं और जगन्नाथ परंपरा पर रिसर्च पर आधारित।