
नई दिल्ली. बारडोली सत्याग्रह एक ऐसा ऐतिहासिक किसान संघर्ष था,जिसने राष्ट्रीय आंदोलन को बड़ी गति दी थी। चौरी चौरा की हिंसक घटना के बाद गांधीजी द्वारा सविनय अवज्ञा आंदोलन वापस ले लिया गया था। जिसकी वजह से देश में चल रहा स्वतंत्रता संग्राम का अभियान सुस्त पड़ गया था। बारडोली के किसानों की बदौलत ही देश का स्वतंत्रता आंदोलन सुस्ती के दौर से बाहर निकला और देश में नई जागृति पैदा हो गई।
बल्लभ भाई पटेल ने किया सत्याग्रह
बारडोली गुजरात के सूरत क्षेत्र का एक किसान गांव था। ब्रिटिश अधिकारियों ने यहां भूमि करों में 30 प्रतिशत तक की वृद्धि कर दी थी। पहले से ही विभिन्न तरह की तकलीफों से जूझ रहे ग्रामीणों के लिए यह बड़ा झटका था। किसानों की दुर्दशा का पता चलने पर वल्लभभाई पटेल, जो अहमदाबाद के नगर अध्यक्ष थे, बारडोली आए और किसानों को लामबंद किया। गांधी द्वारा समर्थित पटेल ने किसानों से करों का भुगतान न करने के लिए कहा और सत्याग्रह शुरू कर दिया। कर में कटौती के पटेल के अनुरोध को बंबई के राज्यपाल ने अनदेखा कर दिया। इसके बजाय उन्होंने आंदोलनकारी किसानों के खिलाफ कई दमनकारी उपाय किए।
किसानों की हुई जीत
बंबई के राज्यपाल ने बारडोली के किसानों पर कहर बरपाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। तब किसानों की व्यापक गिरफ्तारियां हुईं। उन्हें जमीनों से जबरन बेदखल किया गया और जब्त की गई भूमि की नीलामी के प्रयास किए गए। लेकिन पटेल के नेतृत्व में किसानों ने आत्मसमर्पण करने से इनकार कर दिया। अंत में मैक्सवेल ब्रूमफील्ड के तहत एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण को कर वृद्धि की जांच के लिए नियुक्त किया गया था। आयोग ने कर वृद्धि को निरस्त करने का आह्वान किया। वल्लभाई पटेल को बारडोली के किसानों ने पहली बार सरदार नाम से संबोधित किया। किसानों की जीत में स्वतंत्रता आंदोलन में नई ऊर्जा भर दी थी।
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