
नई दिल्ली. देश की आजादी में प्राण न्योछावर करने वाले बटुकेश्वर दत्त का नाम लोग श्रद्धा के साथ लेते हैं। बटुकेश्वर दत्त ऐसे क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्रिटिश हुक्मरानों को सीधे चुनौती दी थी। लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए उन्होंने दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में बम फेंका था, जिसमें कई ब्रिटिश अधिकारी घायल हो गए थे। घटना के बाद भी वे वहां से भागे नहीं बल्कि मेन गेट पर खड़े होकर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते रहे।
कैसे हुई थी वह घटना
8 अप्रैल 1929 का दिन था। दिल्ली की सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली में स्वराज पार्टी के संस्थापक और सरदार पटेल के भाई विट्ठलभाई पटेल मौजूद थे। जैसे ही वे सार्वजनिक सुरक्षा के मुद्दे पर कुछ बोलने के लिए उठे, एक बड़ा विस्फोट हो गया और पूरी असेंबली हिल गई। सभा के बीच में ही दो बम फट गए थे। हर तरफ आग और धुंआ था। दो ब्रिटिश लोग भी घायल हो गए। बम फेंकने वाले दो युवक धुएं से भरे दर्शक दीर्घा में खड़े होकर इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगा रहे थे। वे भागने की बजाय इंकलाब का नारा बुलंद कर रहे थे। वे दोनों कोई और नहीं बल्कि क्रांतिकारी सरदार भगत सिंह औ उनके साथी बटुकेश्वर दत्त थे। उन्होंने पुलिस की पिटाई से मारे गए लाला लाजपत राय का बदला लेने की नीयत से बम फेंके थे। बाद में जब भगत सिंह को लाहौर साजिश मामले में मौत की सजा सुनाई गई तो बटकेश्वर दत्त को अंडमान की सेलुलर जेल में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
कौन थे बटुकेश्वर दत्त
बटुकेश्वर दत्त का जन्म 1910 में पश्चिम बंगाल के बर्धमान जिले में हुआ था। वह कानपुर में पढ़ाई के दौरान भगत सिंह के HSRA में शामिल हो गए थे। वह बम बनाने में माहिर हो गए थे। एचएसआरए ने शुरू में विधानसभा में बम हमले के लिए दत्त और सुखदेव को चुना था क्योंकि भगत सिंह विदेश दौरे की योजना बना रहे थे। लेकिन बाद में यह योजना बदल दी गई और कार्रवाई के लिए भगत सिंह खुद ही बटुकेश्वर दत्त के साथ जुड़ गए।
1965 में हुई मृत्यु
जेल से छूटने के बाद बटुकेश्वर दत्त को तपेदिक हो गया था। फिर भी उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लिया और चार और वर्षों के लिए कारावास की सजा काटी। उन्हें बिहार के चंपारण जेल में बंद कर दिया गया था। बटुकेश्वर दत्त को स्वतंत्र भारत में उचित मान्यता नहीं मिली और 1965 में गरीबी में उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें सतलुज के तट पर पंजाब के फिरोजपुर में हुसैनीवाली में शहीद स्तंभ पर दफनाया गया, जहां भगत सिंह और उनके सभी साथियों के स्मारक हैं।
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