
उज्जैन. देवी धूमावती की उपासना से तंत्र-मंत्र की सिद्धियां प्राप्त की जाती है। ये देवी दस महाविद्याओं में से एक हैं। इन्हें अलक्ष्मी भी कहा जाता है। माता धूमावती की पूजा से क्रोध शांत होता है और गरीबी भी दूर होती है। कष्टों से बचने के लिए देवी धूमावती की पूजा की जाती है। इनका निवास ज्येष्ठा नक्षत्र है। इनकी साधना तांत्रिकों द्वारा तो की ही जाती है। जनसामान्य भी भी इनकी पूजा से कष्टों से मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं। संसार में ऐसी कोई समस्या नहीं, जिसका समाधान देवी धूमावती की पूजा से संभव न हो। आगे जानिए देवी धूमावती की पूजा विधि, शुभ मुहूर्त व अन्य खास बातें…
धूमावती जयंती 2022 तिथि
पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि की शुरूआत 07 जून, मंगलवार को सुबह 07.54 से होगी, जो 08 जून, बुधवार को सुबह 08.30 मिनट तक रहेगी। इन दोनों ही दिन धूमावती जयंती का पर्व मनाया जाएगा।
इस विधि से करें पूजा...
धूमावती जयंती की सुबह जल्द उठकर स्नान आदि करने के बाद किसी साफ स्थान पर देवी धूमावती की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। इसके बाद फूल, सिन्दूर, कुमकुम, चावल, फल, धूप, दीप से पूजा करें और भोग भी लगाएं। पूजा के बाद अपनी मनोकामना मां धूमावती के सामने कहें। मां धूमावती की कृपा से मनुष्य के समस्त पापों का नाश होता है तथा दु:ख, गरीबी आदि दूर होकर मनचाहा फल प्राप्त होता है। इस दिन मां धूमावती की कथा जरूर सुननी चाहिए। मां धूमावती के दर्शन से संतान और पति की रक्षा होती है। परंपरा है कि सुहागिन महिलाएं मां धूमावती का पूजन नहीं करती, बल्कि दूर से ही मां के दर्शन करती हैं।
ये है मां धूमावती की कथा
प्रचलित कथाओं के अनुसार, एक बार माता पार्वती को बहुत तेज भूख लगी। उन्होंने महादेव से भोजन के लिए कहा, इसके बाद भी काफी समय तक भोजन नहीं आया। इधर भूख से व्याकुल माता पार्वती भोजन की प्रतीक्षा कर रही थीं, जब भूख बर्दाश्त नहीं हुई, तो उन्होंने भगवान शिव को ही निगल लिया। ऐसा करते ही उनके शरीर से धुआं निकलने लगा। भगवान शिव उनके पेट से बाहर आ गए और कहा कि “तुमने अपने पति को ही निगल लिया, इसलिए अब से तुम विधवा स्वरूप में रहोगी और धूमावती के नाम से प्रसिद्ध होगी। भगवान शिव ने यह भी वरदान दिया कि जो भी कोई व्यक्ति मां पार्वती के इस स्वरूप की पूजा करेगा उसकी हर मनोकामना पूरी होगी।
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