
उज्जैन. इस बार वट पूर्णिमा व्रत 14 जून, मंगलवार को किया जाएगा। इस दिन महिलाएं बरगद के वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान शिव-पार्वती, सत्यवान-सावित्री और यमराज की पूजा करती हैं। इसके बाद बरगद के वृक्ष की परिक्रमा कर उस पर सूत लपेटकर परिवार की समृद्धि के लिए कामना करती हैं। अनेक धर्म ग्रंथों में इस व्रत का वर्णन मिलता है। योग्य संतान की प्राप्ति के लिए भी ये व्रत किया जाता है। कुछ स्थानों पर ये व्रत ज्येष्ठ अमावस्या तिथि पर भी किया जाता है, वहीं कुछ स्थानों पर ये व्रत पूर्णिमा तिथि पर करने का विधान है। आगे जानिए इस व्रत की विधि व अन्य खास बातें…
इस विधि से करें वट सावित्री पूर्णिमा व्रत (Vat Purnima Vart Puja Vidhi)
- 14 जून, मंगलवार की स्नान आदि करने के बाद वटवृक्ष (बरगद का पेड़) के नीचे महिलाएं व्रत का संकल्प लें और इसके बाद एक टोकरी या किसी बड़े बर्तन में सात प्रकार के अनाज रखकर, उसके ऊपर ब्रह्मा और ब्रह्मसावित्री व दूसरी टोकरी में सत्यवान व सावित्री की प्रतिमा रखकर बरगद के पेड़ के पास पूजा करें।
- इनके साथ ही यमराज की पूजा भी करें। वटवृक्ष की परिक्रमा करें और जल चढ़ाएं। इस दौरान नमो वैवस्वताय मंत्र का जाप करें। नीचे लिखा मंत्र बोलते हुए देवीसावित्री को अर्घ्य दें-
अवैधव्यं च सौभाग्यं देहि त्वं मम सुव्रते।
पुत्रान् पौत्रांश्च सौख्यं च गृहाणार्ध्यं नमोस्तुते।।
- वटवृक्ष पर जल चढ़ाते समय यह बोलें-
वट सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमै:।
यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोसि त्वं महीतले।
तथा पुत्रैश्च पौत्रैस्च सम्पन्नं कुरु मां सदा।।
इस प्रकार पूजा संपन्न होने के बाद अपनी सास व परिवार की अन्य बुजुर्ग महिलाओं का आशीर्वाद लें। सावित्री-सत्यवान की कथा अवश्य सुनें।
ये है सावित्री और सत्यवान की कथा… (Vat Savitri Vrat ki Katha)
- पुरातन समय में भद्र देश के राजा अश्वपति की पुत्री सावित्री का विवाह साल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुआ, दुश्मनों द्वारा राज्य छिन लेने के कारण वे वन में रहते थे।
- सत्यवान अल्पायु है ये जानकर भी सावित्री ने उससे विवाह करना स्वीकार किया। जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होने वाली थी, उसके पहले नारद जी ने ये बात जाकर सावित्री को बता दी।
- उस दिन सावित्री भी उसके साथ जंगल में गई। सत्यवान लकड़ी काटने के लिए एक पेड़ पर चढ़ने लगा वैसे ही उसके सिर में तेज दर्द हुआ और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर सो गए।
- तभी यमराज आए और सत्यवान के प्राण निकालकर ले जाने लगे। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री को कई वरदान दिए और सावित्री की जिद के हारकर उन्हें सत्यवान के प्राण भी छोड़ने पड़े।
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