
उज्जैन. 30 मई को शनि जयंती और सोमवती अमावस्या के साथ इस दिन वट सावित्री व्रत (Vat Savitri Vrat 2022) भी किया जाएगा। इस व्रत का भी हिंदू धर्म में विशेष महत्व बताया गया है। इस तरह एक ही दिन में 3 महापर्व बनना दुर्लभ संयोग है। उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. मनीष शर्मा के अनुसार, ऐसा दुर्लभ संयोग 27 साल पहले 19 मई 1995 को भी बना था। उस समय में ये तीनों पर्व एक ही दिन मनाए गए थे। इन तीनों ही पर्वों में पवित्र नदी में स्नान कर दान करना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस समय शनिदेव स्वयं की राशि कुंभ में विराजमान हैं जो शुभ फल देने वाली स्थिति है।
इसी तिथि पर हुआ था शनिदेव का जन्म
ज्योतिषाचार्य पं. शर्मा के अनुसार, धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि ज्येष्ठ अमावस्या तिथि की रात्रि को शनिदेव का जन्म हुआ था। इनके पिता सूर्यदेव और माता छाया हैं। छाया से उत्पन्न होने के कारण ही इनका रंग काला है और ये हमेशा नीले वस्त्र ही धारण करते हैं। पिता-पुत्र होने के बाद भी सूर्य और शनि एक-दूसरे के शत्रु ग्रह कहलाते हैं। नवग्रहों में शनि को न्यायाधीश का पद प्राप्त है। यानी प्राणियों को अच्छे-बुरे कर्मों का फल शनिदेव ही प्रदान करते हैं। इनका स्वभाव बहुत ही क्रोधी है और इनकी नजर में भी दोष बताया गया है।
ज्योतिष में शनिदेव…
1. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, बुध और शुक्र ग्रह शनि के मित्र हैं। गुरु सम और सूर्य, चंद्र, मंगल शत्रु ग्रह हैं। शनिदेव मकर और कुंभ राशि के स्वामी हैं। इन राशि में ये शुभ फल प्रदान करते हैं। शनि तुला राशि में उच्च के और मेष राशि में नीचे के होते हैं।
2. शनि जिस राशि में होते हैं, उसके आगे की और पीछे की राशि को भी प्रभावित करते हैं। जैसे इस समय शनि कुंभ राशि में है, लेकिन इसके आगे की मीन राशि पर भी शनि की साढेसाती का प्रभाव शुरू हो चुका है, वहीं पीछे की राशि यानी मकर भी साढ़ेसाती का अंतिम चरण है।
3. इसके अलावा शनि जिस राशि में होता है, वहां से छठी और दसवी राशि को भी प्रभावित करता है। उन राशियों पर ढय्या का असर होता है। इस समय कर्क और वृश्चिक राशि शनि की ढय्या से प्रभावित है।
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