
साल 1930 की बात है। आंद्रे मस्करेन्हास मुंबई से गोवा लौटे। वो अपने साथ सिर्फ सामान नहीं, बल्कि एक सपना भी लेकर आए थे। यह सपना मुंबई की ईरानी बेकरियों में सालों तक काम करके सीखी गई कला से बना था। कई लेयर्स वाले वेडिंग केक और बटरक्रीम बनाने की कला में महारत हासिल करने के बाद, उन्होंने पंजिम में एक ऐसी जगह की नींव रखी जो आज शहर की पहचान बन चुकी है: कॉन्फेइतारिया 31 दे जेनेरो।
पंजिम के खूबसूरत इलाके फॉनटेनहास की रंगीन गलियों में छिपी यह बेकरी देखते ही देखते सिर्फ ब्रेड खरीदने की जगह से कहीं ज़्यादा बन गई। यह एक ऐसी जगह बन गई जो ताज़े बेक्ड सामान की खुशबू, कहानियों और अपनेपन के एहसास से भरी थी। आज, इस विरासत को आंद्रे के पोते वॉरेन मस्करेन्हास और उनकी मां ग्लेट्टा आगे बढ़ा रहे हैं। वे न सिर्फ रेसिपी, बल्कि इस जगह की रूह को भी संजोए हुए हैं।
आज जब आप इस बेकरी में कदम रखते हैं, तो दो चीज़ें आपका ध्यान तुरंत खींचती हैं - ताज़े बने सामान की महक और ग्राहकों की कभी न खत्म होने वाली भीड़। कुछ लोग रोज़ की तरह अपनी पसंदीदा चीज़ें लेने आते हैं, तो कुछ सिर्फ बेकरी के नए और खूबसूरत इंटीरियर को देखने। लेकिन नए बदलावों के बावजूद, इस जगह की आत्मा आज भी वही पुरानी है।
यहां आने वाले ग्राहकों में हर उम्र के लोग शामिल हैं, जो इसे और भी खास बनाता है। लाइन में लगे टीनएजर्स अपने फोन में बिज़ी दिखते हैं, तो वहीं 80-90 साल के बुज़ुर्ग भी अपनी आदत और पुरानी यादों के चलते खिंचे चले आते हैं। इनमें से कई तो आंद्रे को व्यक्तिगत रूप से याद करते हैं। उन्हें वो छोटे-छोटे लम्हे याद हैं: जब आंद्रे उनके हाथ में चुपके से एक एक्स्ट्रा कुकी रख देते थे, या खिड़की से थोड़ी बटरक्रीम चखा देते थे, या फिर छोटे-मोटे काम के बदले स्विस रोल के किनारे इनाम में मिलते थे। ये यादें भी उतनी ही इस बेकरी का हिस्सा हैं, जितनी कि यहां की रेसिपी।
आंद्रे ने जब यह बेकरी शुरू की थी, तब उनकी उम्र 20-25 साल के आस-पास थी। शुरुआती दिन मेहनत और लगन से भरे थे। वो अक्सर रात भर काम करते और कभी-कभी तो बेकरी में ही सो जाते थे, ताकि नई-नई चीज़ें बनाकर उन्हें परफेक्ट कर सकें। ब्रेड और केक के अलावा, उन्होंने गोवा की पारंपरिक चीज़ें जैसे प्लम केक, पिनाग, मदेइरन बोलो दे मेल और अब मशहूर हो चुके वाइन बिस्किट बनाने भी शुरू किए।
उनके निधन के बाद, परिवार ने उनकी इस विरासत को ज़िंदा रखने की ठानी। इस काम में ग्लेट्टा ने एक अहम भूमिका निभाई। उन्होंने पुरानी रेसिपी की किताबों को समझने में घंटों बिताए - पुराने ज़माने के नाप-तोल को बदला, पुर्तगाली सामग्री का अनुवाद किया और उन स्वादों को फिर से ज़िंदा किया जो इस बेकरी की पहचान थे।
लेकिन परंपरा को बनाए रखने का मतलब यह कभी नहीं था कि बदलाव को न अपनाया जाए। परिवार ने हमेशा असलियत को खोए बिना आगे बढ़ने के तरीके खोजे। 2021 में हुआ रेनोवेशन इसी संतुलन का एक उदाहरण है। बेकरी के ढांचे को मजबूत और अपडेट किया गया, लेकिन पुराने लकड़ी के इंटीरियर और गर्मजोशी भरे माहौल को बड़ी सावधानी से बरकरार रखा गया। नतीजा एक ऐसी जगह है जो पुरानी यादों से भरी भी लगती है और मॉडर्न भी।
वॉरेन के लिए यह बेकरी बहुत पर्सनल है। बचपन में काउंटर पर बैठने, पैसे गिनने और फोन उठाने की यादें आज होटल मैनेजमेंट प्रोफेशनल के तौर पर रोज़मर्रा के काम में घुलमिल गई हैं। उन्होंने भी बेलीज़ चीज़केक पेस्ट्री और वुड-फायर्ड बास्क चीज़केक जैसी नई चीज़ें मेन्यू में जोड़ी हैं, जो क्लासिक मेन्यू में एक नयापन लाती हैं।
इस बेकरी का दिल है इसकी लकड़ी की भट्टी - एक विशाल 20x20 फुट की जगह जो शुरुआत से ही इस्तेमाल में है। हर सुबह, इसमें ताज़ी ब्रेड और पफ्स बनते हैं, और दिन में केक और दूसरी मिठाइयां। बेकिंग के इस पारंपरिक तरीके से यहां की चीज़ों में एक ऐसा अनोखा स्वाद आता है जो मॉडर्न ओवन में नहीं आ सकता। उतनी ही ज़रूरी बात यह है कि बेकरी किसी भी तरह के प्रिजर्वेटिव का इस्तेमाल नहीं करती। इसका मतलब है कि सामान की शेल्फ लाइफ कम होती है, लेकिन यह ताज़गी और असलियत की गारंटी देता है। हर एक बाइट में आपको देखभाल, धैर्य और कारीगरी का एहसास होता है।
बेकरी की सफलता का एक और स्तंभ इसके कर्मचारी हैं। कई कर्मचारी दशकों से यहां काम कर रहे हैं, कुछ ने तो ट्रेनी के तौर पर शुरुआत की थी। प्रक्रिया की उनकी गहरी समझ और अटूट वफादारी ने पीढ़ियों तक स्वाद को एक जैसा बनाए रखने में मदद की है। यहां की कई पसंदीदा चीज़ों में, 'बोल सांस राइवल' की एक खास जगह है। यह मेरिंग और फ्रेंच बटरक्रीम से बनी एक लेयर्ड मिठाई है। इसका सिग्नेचर क्रंच काजू से आता है, जिन्हें लकड़ी की आग में हल्का-सा भूना जाता है - यह तकनीक खुद आंद्रे ने सिखाई थी।
मेन्यू में गोवा और पुर्तगाल के स्वाद का जश्न आज भी जारी है, जिसमें बेबिंका, डोसे दे ग्राओ, पोये, सेरादुरा और रम बॉल्स जैसी चीज़ें शामिल हैं। हर आइटम के साथ एक कहानी, एक तकनीक और एक ऐसा स्वाद जुड़ा है जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है।
लेकिन जो चीज़ कॉन्फेइतारिया 31 दे जेनेरो को असल में परिभाषित करती है, वह सिर्फ इसका खाना नहीं, बल्कि लोगों का इससे भावनात्मक जुड़ाव है। यह एक ऐसी जगह है जहां पीढ़ियां मिलती हैं, जहां रेसिपी को बचपन की यादों की तरह संजोया जाता है, और जहां अतीत आज भी भविष्य को आकार दे रहा है। पल-पल बदलते फूड ट्रेंड्स की दुनिया में, यह बेकरी एक याद दिलाती है कि कुछ स्वाद - और कुछ कहानियां - हमेशा ज़िंदा रहने के लिए होती हैं।
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