सरोगेसी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है:
1. जेस्टेशनल सरोगेसी: इसमें सरोगेट महिला का बच्चे से कोई जैविक संबंध नहीं होता। भ्रूण पूरी तरह माता-पिता के अंडाणु और शुक्राणु से तैयार किया जाता है। आज के समय में यही तरीका सबसे ज्यादा अपनाया जाता है।
2. ट्रेडिशनल सरोगेसी: इसमें सरोगेट महिला का अंडाणु उपयोग किया जाता है, जिससे उसका बच्चे से जैविक संबंध बनता है। भारत में इस तरीके को अब लगभग अपनाया नहीं जाता।
भारत में सरोगेसी को लेकर सख्त कानून बनाए गए हैं। व्यावसायिक सरोगेसी पूरी तरह प्रतिबंधित है। केवल परोपकारी (Altruistic) सरोगेसी की अनुमति है, जिसमें कोई आर्थिक लेन-देन नहीं होता। कानून के अनुसार, सरोगेसी केवल करीबी रिश्तेदार के माध्यम से ही की जा सकती है। इसके लिए मेडिकल आवश्यकता, सरकारी अनुमति, रजिस्ट्रेशन और कानूनी दस्तावेज अनिवार्य हैं। इन नियमों का उद्देश्य महिलाओं के शोषण को रोकना और प्रक्रिया को पारदर्शी बनाना है।