50+ Eid Mubarak Shayari: ईद का चांद तुमने देख लिया…' 50+ रोमांटिक शायरियों से महबूब को दें मुबारकबाद

Published : Mar 20, 2026, 07:30 AM IST
Eid Mubarak Shayari

सार

Eid Shayari For Lovers: ईद का चांद देखने के बाद अगर आप अपने महबूब को मुबारकबाद देना है, तो शायरी से बेहतर और क्या हो सकता है। यहां पर हम आपको 2 लाइन शायरी बताने जा रहे हैं, जिसे कई शायरों ने लिखा है, जो सीधे आपके महबूब के दिल तक जाएगी। 

50 Eid Mubarak Shayari: ईद का चांद सिर्फ एक त्योहार की शुरुआत नहीं, बल्कि प्यार, खुशियों और नए एहसासों का पैगाम लेकर आता है। जब आसमान में चांद चमकता है, तो दिल अपने महबूब को याद करता है। ऐसे में अगर आप भी अपने प्यार को खास अंदाज में ईद मुबारक कहना चाहते हैं, तो ये 50+ रोमांटिक शायरियां आपके जज्बातों को खूबसूरती से बयां करेंगी।

ईद का चांद तुम ने देख लिया

चांद की ईद हो गई होगी

इदरीस आजाद

 

ईद का दिन है गले आज तो मिल ले ज़ालिम

रस्म-ए-दुनिया भी है मौक़ा भी है दस्तूर भी है

कमर बदायुनी

 

ईद पर मसरूर हैं दोनों मियां बीवी बहुत

इक खरीदारी से पहले इक खरीदारी के ब'अद

सरफराज शाहिद

 

हम ने तुझे देखा नहीं क्या ईद मनाएं

जिस ने तुझे देखा हो उसे ईद मुबारक

लियाकत अली आसिम

 

जिस तरफ तू है उधर होंगी सभी की नजरें

ईद के चांद का दीदार बहाना ही सही

अमजद इस्लाम अमजद

 

ईद आई तुम न आए क्या मजा है ईद का

ईद ही तो नाम है इक दूसरे की दीद का

अज्ञात

 

फलक पे चांद सितारे निकलते हैं हर शब

सितम यही है निकलता नहीं हमारा चांद

पंडित जवाहर नाथ साकी

 

देखा हिलाल ए ईद तो आया तेरा खयाल

वो आसमान का चांद है तू मेरा चांद है

अज्ञात

 

मिल के होती थी कभी ईद भी दीवाली भी

अब ये हालत है कि डर डर के गले मिलते हैं

अज्ञात

 

उस से मिलना तो उसे ईद मुबारक कहना

ये भी कहना कि मिरी ईद मुबारक कर दे

दिलावर अली आजर

 

ऐ हवा तू ही उसे ईद मुबारक कहियो

और कहियो कि कोई याद किया करता है

त्रिपुरारी

 

कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती

हम को अगर मयस्सर जानां की दीद होती

गुलाम भीक नैरंग

 

जो लोग गुजरते हैं मुसलसल रह ए दिल से

दिन ईद का उन को हो मुबारक तह ए दिल से

ओबैद आजम आजमी

 

ईद का दिन है सो कमरे में पड़ा हूं असलम

अपने दरवाजे को बाहर से मुकफ्फल कर के

असलम कोलसरी

 

उस मेहरबां नजर की इनायत का शुक्रिया

तोहफा दिया है ईद पे हम को जुदाई का

अज्ञात

 

माह ए नौ देखने तुम छत पे न जाना हरगिज

शहर में ईद की तारीख बदल जाएगी

जलील निजामी

 

ईद के बाद वो मिलने के लिए आए हैं

ईद का चांद नजर आने लगा ईद के बाद

अज्ञात

 

ईद अब के भी गई यूं ही किसी ने न कहा

कि तिरे यार को हम तुझ से मिला देते हैं

मुसहफी गुलाम हमदानी

 

वादों ही पे हर रोज मिरी जान न टालो

है ईद का दिन अब तो गले हम को लगा लो

मुसहफी गुलाम हमदानी

 

शहर खाली है किसे ईद मुबारक कहिए

चल दिए छोड़ के मक्का भी मदीना वाले

अख्तर उस्मान

 

देखा हिलाल ए ईद तो तुम याद आ गए

इस महवियत में ईद हमारी गुजर गई

अज्ञात

 

आज यारों को मुबारक हो कि सुबह ए ईद है

राग है मय है चमन है दिलरुबा है दीद है

आबरू शाह मुबारक

 

ईद तू आ के मिरे जी को जलावे अफसोस

जिस के आने की खुशी हो वो न आवे अफसोस

मुसहफी गुलाम हमदानी

 

महक उठी है फजा पैरहन की खुशबू से

चमन दिलों का खिलाने को ईद आई है

मोहम्मद असदुल्लाह

 

है ईद का दिन आज तो लग जाओ गले से

जाते हो कहां जान मिरी आ के मुकाबिल

मुसहफी गुलाम हमदानी

 

ईद का दिन तो है मगर जाफर

मैं अकेले तो हंस नहीं सकता

जाफर साहनी

 

हासिल उस महलका की दीद नहीं

ईद है और हम को ईद नहीं

बेखुद बदायुनी

 

ईद का चांद जो देखा तो तमन्ना लिपटी

उन से तकरीब ए मुलाकात का रिश्ता निकला

रहमत करनी

 

तू आए तो मुझ को भी

ईद का चांद दिखाई दे

हरबंस सिंह तसव्वुर

 

अब्रू का इशारा किया तुम ने तो हुई ईद

ऐ जान यही है मह ए शव्वाल हमारा

हातिम अली मेहर

 

किसी की याद मनाने में ईद गुजरेगी

सो शहर ए दिल में बहुत दूर तक उदासी है

इसहाक विरदग

 

रास आ जातीं हमें भी ईद की खुशियां तमाम

काश तू भी पास होता ईद के लम्हात में

अज्ञात

 

आई ईद व दिल में नहीं कुछ हवा ए ईद

ऐ काश मेरे पास तू आता बजाए ईद

शेख जहूरुद्दीन हातिम

 

ईद का दिन है गले मिल लीजे

इख्तिलाफात हटा कर रखिए

अब्दुल सलाम बंगलौरी

 

ईद में ईद हुई ऐश का सामान देखा

देख कर चांद जो मुंह आप का ऐ जान देखा

शाद अजीमाबादी

 

लैलतुल कद्र है हर शब उसे हर रोज है ईद

जिस ने मय खाने में माह ए रमजान देखा है

मुनव्वर खान गाफिल

 

वहां ईद क्या वहां दीद क्या

जहां चांद रात न आई हो

शारिक कैफी

 

ईद को भी वो नहीं मिलते हैं मुझ से न मिलें

इक बरस दिन की मुलाकात है ये भी न सही

शोला अलीगढ़ी

 

है ईद मय कदे को चलो देखता है कौन

शहद ओ शकर पे टूट पड़े रोजेदार आज

सय्यद यूसुफ अली खान नाजिम

 

जहां न अपने अजीजों की दीद होती है

जमीन ए हिज्र पे भी कोई ईद होती है

ऐन ताबिश

 

शाम के साए बालिश्तों से नापे हैं

चांद ने कितनी देर लगा दी आने में

गुलजार

 

खुद तो आया नहीं और ईद चली आई है

ईद के रोज मुझे यूं न सताए कोई

अज्ञात

 

छुप गया ईद का चांद निकल कर देर हुई पर जाने क्यों

नजरें अब तक टिकी हुई हैं मस्जिद के मीनारों पर

शायर जमाली

 

मैं अपने आप से रहता हूं दूर ईद के दिन

इक अजनबी सा तकल्लुफ नए लिबास में है

इदरीस आजाद

 

क्या लुत्फ ए ईद है जो अगर तुम से दूर हों

गुजरेगा रोज ए ईद तसव्वुर में आप के

 

कई फाकों में ईद आई है

आज तू हो तो जान हम आगोश

ताबां अब्दुल हई

 

कुछ देर उस ने देख लिया चांद की तरफ

कुछ देर आज चांद को इतराना चाहिए

अकील नोमानी

 

मेरी तो पोर पोर में खुश्बू सी बस गई

उस पर तिरा खयाल है और चांद रात है

वसी शाह

 

इश्क ए मिजगां में हजारों ने गले कटवाए

ईद ए कुर्बां में जो वो ले के छुरी बैठ गया

शाद लखनवी

 

अगर हयात है देखेंगे एक दिन दीदार

कि माह ए ईद भी आखिर है इन महीनों में

मिर्जा रजा बर्क

 

जब आया ईद का दिन घर में बेबसी की तरह

तो मेरे फूल से बच्चों ने मुझ को घेर लिया

बिस्मिल साबरी

 

मुझ को तो ईद में भी फरागत कहां मिली

लड़ती रही है सास सवेरे से शाम तक

साजिद सजनी लखनवी

 

वो सुबह ए ईद का मंज़र तिरे तसव्वुर में

वो दिल में आ के अदा तेरे मुस्कुराने की

फानी बदायुनी

 

बादबां नाज से लहरा के चली बाद ए मुराद

कारवां ईद मना काफिला सालार आया

जोश मलीहाबादी

 

खुशी है सब को रोज ए ईद की यां

हुए हैं मिल के बाहम आशना खुश

मीर मोहम्मदी बेदार

 

आप ने ईद मुबारक तो कहा है लेकिन

आप ने ईद मनाने की इजाजत नहीं दी

महवर सिरसिवी

 

रहना पल पल ध्यान में

मिलना ईद के ईद में

हसन शाहनवाज जैदी

 

मय पी के ईद कीजिए गुजरा मह ए सियाम

तस्बीह रखिए सागर ओ मीना उठाइए

वजीर अली सबा लखनवी

 

वादा ए वस्ल दिया ईद की शब हम को सनम

और तुम जा के हुए शीर ओ शकर और कहीं

मुसहफी गुलाम हमदानी

 

निकले हैं घर से देखने को लोग माह ए ईद

और देखते हैं अबरू ए खमदार की तरफ

परवीन उम्म ए मुश्ताक

 

मह जबीं ईद में अंगुश्त नुमा क्यों न रहें

ईद का चांद ही अंगुश्त नुमा होता है

सफी औरंगाबादी

 

छेड़ा है एक नगमा ए शिरीं भी कू ब कू

दिल ने हिलाल ए ईद की ताईद के लिए

अफरोज रिजवी

 

तुम्हारे इश्क ए अबरू में हिलाल ए ईद की सूरत

हजारों उंगलियां उठीं जिधर से हो के हम निकले

किशन कुमार वकार

 

ईद है हम ने भी जाना कि न होती गर ईद

मय फरोश आज दर ए मय कदा क्यों वा करता

सय्यद यूसुफ अली खान नाजिम

 

क्या खबर है हम से महजूरों की उन को रोज ए ईद

जो गले मिल कर बहम सर्फ ए मुबारकबाद हैं

मुनव्वर खान गाफिल

 

अल्लाह रसूल वाला ईमान आप रखिए

हम तो हैं ईद वाले रमजान आप रखिए

फरहत एहसास

 

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