
बेंगलुरुः पत्नी की क्रूरता बर्दाश्त नहीं होती, तलाक चाहिए - पति की इस दलील पर कर्नाटक हाईकोर्ट ने उसकी अपील खारिज कर दी। युवक ने बेंगलुरु फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने कहा कि उसे पत्नी नहीं, बल्कि एक वफादार नौकरानी चाहिए थी। कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि शादीशुदा ज़िंदगी में दोनों को समझौता करना पड़ता है।
जस्टिस जयंत बनर्जी और उमेश अडिगा की डिविजन बेंच ने 15 सितंबर को बेंगलुरु फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ युवक की अपील पर सुनवाई की। फैमिली कोर्ट ने युवक की तलाक की अर्जी खारिज कर दी थी। फैमिली कोर्ट ने कहा था कि पत्नी यह साबित करने में कामयाब रही कि पति और उसका परिवार दहेज को लेकर नाखुश थे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2015 में शादी करने वाला यह जोड़ा सिर्फ दस दिन ही साथ रहा। युवक ने बताया कि जब वह अमेरिका में काम कर रहा था, तो उसकी पत्नी सिंगापुर में नौकरी करने चली गई थी। शादी के बाद पत्नी ने उसके साथ अमेरिका में रहने से इनकार कर दिया, जिसके बाद उसने 2016 में फैमिली कोर्ट में तलाक की कार्यवाही शुरू की। वहीं, पत्नी ने हाईकोर्ट में बताया कि उसका पति और सास दहेज और संपत्ति को लेकर नाखुश थे। उसने यह भी कहा कि पति ने अमेरिका साथ ले जाने के लिए उसके वीजा के लिए कुछ नहीं किया। पत्नी ने यह भी दावा किया कि उसकी सास लगातार उनकी ज़िंदगी में दखल देती थी, जिससे शांतिपूर्ण शादीशुदा ज़िंदगी जीना नामुमकिन हो गया था।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें कहा गया था कि पति की उम्मीदें गलत थीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी के क्रूर होने की बात सच नहीं है। कोर्ट ने कहा, "शादी कोई बच्चों का खेल नहीं है। शादीशुदा ज़िंदगी जीने के लिए पति-पत्नी को एक-दूसरे के साथ समझौता और तालमेल बिठाना पड़ता है।"
बेंच ने आगे कहा, "यह साफ है कि याचिकाकर्ता को पत्नी से ज़्यादा एक आज्ञाकारी और वफादार नौकरानी की ज़रूरत थी। वह अपनी पत्नी से बहुत ज़्यादा उम्मीदें रखता था, जिसमें यह भी शामिल था कि उसकी जीवनसाथी हर काम उसकी मर्जी के मुताबिक करे। पति ने ऐसे मामूली मुद्दे उठाए, जिन्हें आपसी बातचीत और समझ से सुलझाया जा सकता था।"
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