
Premanand Ji Maharaj: बेटी पराई धन होती है...उसके घर का पानी माता-पिता को नहीं पीना चाहिए..ऐसी मान्यता आज भी हमारे समाज में चली आ रही है। माता-पिता भले ही कष्ट में रहें, लेकिन वो बेटी के घर जाकर सेवा नहीं करना चाहते हैं। जिसकी कसक एक बेटी महसूस करती है। सवाल है कि क्या सदियों से चली आ रही ये मान्यता सही है या फिर पैरेंट्स को अपनी सोच बदलनी चाहिए। वृदांवन के संत प्रेमानंद जी महाराज ने एक भक्त के सवाल पर इसका जवाब दिया।
संत प्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि जिसने जन्म दिया, पाला-पोसा, उसका अधिकार केवल बेटे के घर तक क्यों सीमित हो? बेटी का भी उतना ही कर्तव्य है जितना बेटे का। धार्मिक दृष्टिकोण से देखें तो माता-पिता को सेवा और सम्मान देना हर संतान का धर्म है,चाहे वह बेटा हो या बेटी।
उन्होंने कहा कि हिंदू धर्मग्रंथों में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि माता-पिता को बेटी के घर नहीं रहना चाहिए। प्रेमानंद जी स्पष्ट करते हैं कि यह केवल समाज द्वारा बनाई गई परंपरा है, जिसका कोई आध्यात्मिक या धार्मिक आधार नहीं है।
प्रेमानंद जी महाराज ने कहा कि अगर माता-पिता की सेवा बेटा नहीं कर रहा है तो यह बेटी का कर्तव्य है कि वो अपने जन्मदाता की सेवा करें। उनका ख्याल रखें। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बेटी को अपने पति से जरूर इस बारे में बात करना चाहिए।
प्रेमानंद जी का मत है कि बेटा-बेटी में फर्क करना ही सबसे बड़ा पाप है। जो बेटा माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज दे और जो बेटी उन्हें स्नेह से रखे क्या वहां भी हम सिर्फ परंपरा के नाम पर बेटे को ही श्रेष्ठ मानें? बेटी के घर का खाना खाने या पानी पीने से कोई पाप नहीं लगता है।अगर बेटी आपका मान रखते हुए आपकी सेवा कर रही है तो बिल्कुल वहां जाकर रह सकते हैं।
यह एक पुरानी सामाजिक सोच है जिसे बदलने की जरूरत है। संत प्रेमानंद जी जैसे संतों की वाणी हमें यह सिखाती है कि सच्चा धर्म वह है, जिसमें प्रेम, सेवा और सम्मान हो चाहे वह बेटे से मिले या बेटी से।
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