
Meghalaya Living Root Bridge: अगर कोई कहे कि पुल भी सांस लेते हैं, तो शायद आपको मज़ाक लगे। लेकिन यह सच है। मेघालय में ऐसे पुल हैं जिनमें जान है। भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय का नाम ही बादलों का घर है। यह देश में सबसे ज़्यादा बारिश वाली जगहों में से एक है। यह पूरा इलाका पहाड़ों, घने जंगलों और अनोखे जीव-जंतुओं से भरा है। इसी कुदरती खूबसूरती के बीच एक ऐसी परंपरा है जो दुनिया को हैरान कर देती है। यह परंपरा है जिंदा जड़ों से बने पुल (Living Roots Bridge) बनाने की।
ये पुल सीमेंट, लोहे या सूखी लकड़ी से नहीं बने हैं। इन्हें बनाने के लिए पेड़ों की जिंदा जड़ों को सालों तक सहेजा जाता है, उन्हें मोड़ा जाता है और एक से दूसरी जगह जाने के लिए रास्ता तैयार किया जाता है। आज के ज़माने में जब एक मां के लिए अपनी बेटी के बाल गूंथना भी मुश्किल काम लगता है, तब मेघालय के आदिवासी लोग सालों की मेहनत से पेड़ की जड़ों को चोटी की तरह गूंथकर इतना मज़बूत पुल बना देते हैं, जिस पर एक साथ कई लोग आराम से चल-फिर सकते हैं। यह वाकई किसी अजूबे से कम नहीं है।
यहां ज़्यादातर साल बारिश होती है, इसलिए नदी-नालों में पानी का बहाव तेज़ रहता है। इस वजह से कई बार आस-पास के गांवों का संपर्क टूट जाता है। हाल के सालों में कुछ छोटे पुल बने हैं, लेकिन दशकों से यहां के लोग सरकार का इंतज़ार किए बिना अपनी पारंपरिक कला से पुल बनाते आ रहे हैं। बायो-इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना ये 'जिंदा पुल' आज भी इस्तेमाल में हैं।
ये पुल सिर्फ आने-जाने का ज़रिया नहीं हैं, बल्कि ये स्थानीय लोगों की संस्कृति, आपसी सहयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक हैं। एक पुल को पूरी तरह तैयार होने में कई पीढ़ियों की मेहनत लगती है। यह समुदाय की एकता और दूर की सोच को दिखाता है। एक ऐसा पुल जो लगातार बढ़ता रहता है, यह इंसानी सोच और प्रकृति की ताकत का जीता-जागता सबूत है। मेघालय में तीन मुख्य जनजातियां हैं- खासी, गारो और जयंतिया। जिन पहाड़ियों पर ये समुदाय रहते हैं, उन्हें भी इन्हीं नामों से जाना जाता है। इनमें से खासी और जयंतिया समुदाय के लोग सदियों से बड़े प्यार से इन जिंदा जड़ों वाले पुलों को बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
इसके लिए वे नदी-नालों के दोनों किनारों पर रबर के पेड़ (Ficus elastica) लगाते हैं। स्थानीय भाषा में इन्हें 'जिंगकिएंग ज्री' कहते हैं। यह पेड़ कुछ-कुछ हमारे यहां के बरगद जैसा होता है, जिसकी जड़ें या 'बीलल' हवा में लटकती हैं। करीब 15 से 30 सालों में इन पेड़ों की जड़ें एक-दूसरे से जुड़कर जाल बना लेती हैं। जब ये जड़ें पतली होती हैं, तभी से उन्हें पुल की शक्ल में गूंथना शुरू कर दिया जाता है। यानी जड़ों को बढ़ने का रास्ता दिखाया जाता है। जैसे-जैसे जड़ें मोटी होती हैं, पुल की मज़बूती बढ़ती जाती है। जब तक जड़ें पूरी तरह मज़बूत नहीं हो जातीं, कुछ सालों तक पुल पर चलना मना होता है। मज़बूती पक्की होने के बाद ही इसे इस्तेमाल के लिए खोला जाता है।
ये पुल पूरी तरह से इको-फ्रेंडली हैं। इन्हें बनाने के लिए पेड़ काटने की ज़रूरत नहीं पड़ती। ये प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर लोगों की मदद करते हैं। साथ ही, इनकी उम्र भी बहुत लंबी होती है। स्थानीय लोग बताते हैं कि कुछ पुल 300 से 500 साल से भी ज़्यादा पुराने हैं। जैसे-जैसे पेड़ की उम्र बढ़ती है, जड़ें और मज़बूत होती जाती हैं और पुल ज़्यादा वज़न सहने लायक बन जाता है। एक साथ कई लोगों के चलने पर भी यह पुल हिलता तक नहीं, इतना पक्का होता है। हाल ही में इन जिंदा जड़ों वाले पुलों को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने का प्रस्ताव भेजा गया है। उम्मीद है कि इस प्रस्ताव को जल्द ही मंज़ूरी मिल जाएगी।
आज जब दुनिया कंक्रीट और स्टील पर भरोसा करती है, तब मेघालय के एक छोटे से गांव के एक शख्स ने जड़ों पर टिका भविष्य दिखाया है। यह सब बताने की वजह हैं 2026 के पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुने गए मेघालय के हैली वार। वह एक आम किसान हैं, जिन्होंने पेड़ की जिंदा जड़ों का इस्तेमाल करके करीब 70 फुट लंबा पुल बनाया है।
दुनिया में सबसे ज़्यादा बारिश के लिए मशहूर चेरापूंजी (अब यह रिकॉर्ड मौसिनराम गांव के नाम है) की पहाड़ियों के नीचे एक छोटा सा गांव है सीज। यहीं के रहने वाले हैली वार अपने छोटे से खेत में सुपारी, पान, काली मिर्च और फल उगाते हैं। वह करीब 40 साल तक इस गांव के मुखिया भी रहे हैं। जिंदा जड़ों से पुल बनाकर अगली पीढ़ी को प्रेरित करने वाले हैली वार को भारत सरकार ने 2026 के प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुना है। अब तक गुमनामी में जी रहे हैली वार अचानक देश की नज़रों में आ गए हैं। उनकी दशकों की निस्वार्थ सेवा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। लेकिन इस शख्स पर कोई घमंड नहीं है, वह आज भी अपना समय और मेहनत इन जिंदा पुलों को मज़बूत करने में लगा रहे हैं।
भारत सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय के बेंगलुरु स्थित पत्र सूचना कार्यालय (PIB) ने हाल ही में पत्रकारों के एक दल को मेघालय दौरे पर भेजा था। इस दौरान टीम ने सीज गांव जाकर जिंदा जड़ों से बने 'उमकर' पुल को देखा और इसे बनाने वाले 69 साल के हैली वार से बातचीत की। उन्होंने बताया कि 10 साल की उम्र से ही उन्होंने अपने दादा के मार्गदर्शन में जड़ों से पुल बनाने की कला सीखी। यह कोई खेल या पढ़ाई नहीं थी, बल्कि ज़िंदगी का हिस्सा था। बारिश के मौसम में उनके गांव से दूसरे गांव जाने के रास्ते में 'उमकर' नाम की एक छोटी नदी या नाला तेज़ी से बहता था, जिसे पार करना बहुत मुश्किल था। इसे देखकर उन्होंने जिंदा जड़ों का पुल बनाने का फैसला किया।
आज यह पुल हज़ारों टूरिस्ट को अपनी ओर खींचता है। यह एक डबल डेकर (दो मंजिला) पुल है। इसका मतलब है कि जब पानी का बहाव बहुत ज़्यादा हो, तो ऊपर वाले रास्ते से भी नदी पार की जा सकती है। चार साल पहले सरकार ने इसी जगह पर मनरेगा योजना के तहत एक छोटा पुल बनाया है। लेकिन जब बारिश तेज़ होती है, तो सरकारी पुल काम नहीं आता। तब लोगों को दूसरे गांव जाने के लिए इसी जिंदा जड़ों वाले पुल का सहारा लेना पड़ता है।
बारिश के मौसम में यहां आने पर ही इस पुल का असली महत्व समझ में आता है। हम जब गए थे, तब बारिश का मौसम नहीं था, इसलिए हमें इसकी अहमियत उतनी महसूस नहीं हुई। हैली वार बताते हैं, 'बचपन में मैं अपने पिता और दादा के साथ जड़ों को पुल में बदलने के लिए जाता था। धीरे-धीरे मैंने यह अनोखी कला सीख ली। मैंने अब तक तीन ऐसे प्राकृतिक पुल बनाए हैं।'
पद्मश्री मिलने पर उन्होंने कहा, 'मैं सुपारी, पान और काली मिर्च उगाने वाला एक किसान हूं। इस सम्मान के लिए मैं सबसे पहले भगवान का शुक्रिया अदा करता हूं। मैं उन सभी का आभारी हूं जिन्होंने इस पुरस्कार के लिए मेरा नाम चुना। यह मेरे समुदाय, मेरे पूर्वजों और प्रकृति को मिला सम्मान है।'
जिंदा जड़ों का पुल बनाना कुछ दिनों या सालों का काम नहीं है, यह दशकों की तपस्या है। जब पेड़ से जड़ें निकलती हैं, तो उन्हें रास्ता दिखाया जाता है। जड़ें बढ़कर एक-दूसरे में गुंथ जाती हैं। आखिर में, इंसान के सब्र के इनाम के तौर पर प्रकृति एक पुल तैयार कर देती है। हैली वार कहते हैं कि इस काम में जल्दबाज़ी की कोई जगह नहीं है। उनकी बात उनके जीवन के फलसफे को बताती है, 'हम जड़ों को उगाते नहीं, हम उन्हें बढ़ने का मौका देते हैं।'
आज जो पुल हम देख रहे हैं, उसे बनाने में करीब पचास साल लगे। लेकिन उनका काम यहीं खत्म नहीं हुआ। वह आज भी हर दिन पुल की देखभाल करते हैं, उसे मज़बूत बनाते हैं, ताकि अगली पीढ़ी को इसे सुरक्षित सौंप सकें। इस उम्र में भी उनकी आंखों में चमक और हाथों में जो फुर्ती है, वह बताती है कि यह काम उनकी आत्मा का हिस्सा है। इस दौरान हैली वार के बेटे विलिंगसन ने कहा, 'पिता के काम ने मेरी ज़िंदगी की दिशा बदल दी है। मैं भी इस परंपरा को आगे बढ़ा रहा हूं। यह हमारे परिवार का काम नहीं, हमारी संस्कृति की ज़िम्मेदारी है।'
सीज गांव की खामोशी में खड़े होकर जब आप इस जिंदा पुल को देखते हैं, तो एक सच समझ आता है। प्रकृति को जीतना नहीं है, बस उसे समझना है। हैली वार की ज़िंदगी यही सबक सिखाती है। हैली वार अब अपनी उम्र के इस पड़ाव पर प्रकृति प्रेम और जिंदा जड़ों से पुल बनाने की यह कला स्थानीय युवाओं को भी सिखा रहे हैं। ऐसे लोगों की संख्या बढ़नी चाहिए।