
दुनिया के सात अजूबों में शामिल ताज महल प्रेम का प्रतीक माना जाता है। हर साल लाखों पर्यटक आगरा पहुंचकर इसकी खूबसूरती को निहारते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि “ताज महल” इसका असली नाम नहीं है? इतिहासकारों के अनुसार, मुगल सम्राट शाहजहां ने अपनी प्रिय पत्नी मुमताज महल की याद में जो भव्य मकबरा बनवाया, उसका मूल नाम कुछ और था। समय के साथ उसका नाम बदलता गया और आज हम उसे ताज महल के नाम से जानते हैं। आइए जानते हैं इसका असली नाम और उससे जुड़ी रोचक बातें।
इतिहास में दर्ज फारसी अभिलेखों के अनुसार ताज महल का मूल नाम “रौज़ा-ए-मुन्नव्वरा” (Rauza-i-Munawwara) था। इसका अर्थ होता है – “प्रकाश से भरा हुआ मकबरा” या “जगमगाता हुआ स्मारक।” कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों में इसे “रौज़ा-ए-मुमताज” भी कहा गया है, जिसका अर्थ है मुमताज का मकबरा। धीरे-धीरे यह नाम संक्षिप्त होकर “ताज महल” के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
शाहजहां ने 1632 में अपनी पत्नी मुमताज महल की मृत्यु के बाद इस स्मारक का निर्माण शुरू कराया। मुमताज का असली नाम अर्जुमंद बानो बेगम था, और “मुमताज महल” उनका शाही खिताब था। चूंकि यह स्मारक उनकी याद में बनवाया गया था, इसलिए इसका नाम भी उसी से जुड़ा हुआ रखा गया। फारसी भाषा उस समय मुगल दरबार की आधिकारिक भाषा थी, इसलिए नाम भी फारसी में रखा गया।
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इतिहासकारों का मानना है कि “ताज महल” नाम दरअसल “मुमताज महल” से ही लिया गया है। आम लोगों के लिए “रौज़ा-ए-मुन्नव्वरा” बोलना कठिन था, इसलिए समय के साथ यह नाम छोटा होकर “ताज महल” बन गया। अंग्रेजों के शासनकाल में भी इसी नाम को आधिकारिक रूप से इस्तेमाल किया जाने लगा, और फिर यही नाम दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गया।
आज ताज महल सिर्फ एक मकबरा नहीं, बल्कि प्रेम और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। यह स्मारक न केवल भारत की शान है, बल्कि यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल के रूप में भी मान्यता प्राप्त है। चाहे इसका असली नाम कुछ भी रहा हो, लेकिन “ताज महल” नाम आज विश्वभर में अमर हो चुका है।
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