2008 Malegaon Blast: 17 साल तक चली जांच कैसे आगे बढ़ी, जानिए बड़ी बातें

Published : Jul 31, 2025, 10:02 AM ISTUpdated : Jul 31, 2025, 11:37 AM IST
Sadhvi Pragya Singh

सार

29 सितंबर 2008 को मालेगांव में धमाका हुआ था, जिससे 6 लोग मारे गए थे। स्पेशल NIA कोर्ट ने फैसला सुनाया है। साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर समेत सभी 7 आरोपियों को बरी कर दिया है। 

2008 Malegaon Blast: मुंबई की एक स्पेशल कोर्ट 2008 में हुए मालेगांव विस्फोट मामले में गुरुवार को फैसला सुनाया। इस केस में पूर्व भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित समेत 7 आरोपी थे। सभी को बरी कर दिया गया है। महाराष्ट्र के नासिक जिले के मालेगांव में बम विस्फोट हुआ था, जिसके चलते 6 लोग मारे गए थे और 101 घायल हुए थे। अब घटना के करीब 17 साल बाद फैसला आया। आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) और आतंकवाद विरोधी कानून के तहत आरोप लगाए गए थे। 

2008 मालेगांव विस्फोट क्या था?

29 सितंबर 2008 को मालेगांव के एक मुस्लिम बहुल इलाके के एक चौक पर विस्फोट हुआ था। उस वक्त रमजान का महीना था। संदेह था कि धमाका सांप्रदायिक दरार पैदा करने के लिए किया गया। इसके लिए समय हिंदू नवरात्रि उत्सव से ठीक पहले मुस्लिम पवित्र महीने का चुना था। इस मामले की जांच स्थानीय पुलिस से महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (एटीएस) को सौंप दी गई थी।

एटीएस जांच में मालेगांव विस्फोट को लेकर क्या खुलासा हुआ?

एटीएस को संदेह था कि बाइक पर IED (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) लगाया गया था। जांच में पता चला कि बाइक का रजिस्ट्रेशन नंबर फर्जी था। इसके इंजन नंबर और चेसिस नंबर मिटा दिए गए थे। मिटाए गए नंबरों का पता लगाने के लिए बाइक को फोरेंसिक लैब भेजा गया। जांच एजेंसी ने खुलासा किया कि बाइक की मालिक प्रज्ञा सिंह ठाकुर थीं। उन्हें 23 अक्टूबर 2008 को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ के बाद, एटीएस ने अन्य आरोपियों को भी गिरफ्तार कर लिया।

धमाके के दो सप्ताह बाद कर्नल पुरोहित समेत कुल 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया। आरोपियों ने कथित तौर पर अभिनव भारत नामक एक संगठन बनाया था और उन पर महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम 1999 (मकोका) के तहत आरोप लगाए गए थे। एटीएस ने जनवरी 2009 में आरोपपत्र दाखिल किया। इसमें 11 लोगों को आरोपी बनाया गया। कहा गया कि उन्होंने “मुस्लिम लोगों द्वारा किए गए आतंकवादी कृत्यों का बदला लेने के लिए” विस्फोट किया।

2011 में एनआईए को सौंपी गई मालेगांव विस्फोट की जांच

2011 में एनआईए को मालेगांव विस्फोट की जांच की जिम्मेदारी दी गई। 2016 में एनआईए ने इस मामले में एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट पेश किया और मकोका के तहत लगाए गए आरोपों को हटा दिया। एनआईए ने कहा कि एटीएस द्वारा संगठित अपराध कानून का जिस तरह से इस्तेमाल किया गया वह "संदिग्ध" था।

एनआईए ने यह भी दावा किया कि प्रज्ञा ठाकुर के खिलाफ एटीएस द्वारा जुटाए गए सबूतों में कई खामियां पाई गईं। 11 आरोपियों में से केवल सात के खिलाफ ही सबूत थे। जांच एजेंसी ने यह भी कहा कि बाइक प्रज्ञा ठाकुर की थी, लेकिन इसका इस्तेमाल फरार आरोपी रामचंद्र कलसांगरा कर रहा था। विस्फोट से कम से कम डेढ़ साल पहले से बाइक उसके पास थी।

NIA ने की प्रज्ञा ठाकुर का नाम हटाने की मांग

NIA ने प्रज्ञा सिंह ठाकुर का नाम आरोपी के रूप से हटाने की मांग की, लेकिन एक स्पेशल कोर्ट ने कहा कि उनके इस दावे को स्वीकार करना मुश्किल है कि विस्फोट से उनका कोई संबंध नहीं है। कोर्ट ने NIA के इस सुझाव को स्वीकार किया कि मामले में मकोका नहीं लगाया जा सकता, लेकिन उसने कहा कि सात आरोपियों - साध्वी ठाकुर, प्रसाद पुरोहित, रमेश उपाध्याय, समीर कुलकर्णी, सुधाकर ओंकारनाथ चतुर्वेदी, अजय राहिरकर और सुधाकर द्विवेदी पर यूएपीए, आईपीसी और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 के तहत मुकदमा चलाया जाएगा। कोर्ट ने सबूतों की कमी के चलते शिवनारायण कलसांगरा, श्यामलाल साहू और प्रवीण तकलकी को बरी कर दिया। दो आरोपियों, राकेश धावड़े और जगदीश म्हात्रे पर केवल शस्त्र अधिनियम के तहत मुकदमा चलेगा।

2018 में कोर्ट में शुरू हुई मालेगांव धमाका केस में सुनवाई

मुंबई की एक स्पेशल कोर्ट ने सातों आरोपियों के खिलाफ मुकदमा चलाया। 2018 में शुरू हुआ यह मुकदमा 19 अप्रैल, 2025 को पूरा हुआ। फैसला सुरक्षित रख लिया गया था।

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