
Al-Falah University FIR: दिल्ली ब्लास्ट केस में अल-फलाह यूनिवर्सिटी पर शिकंजा कसता जा रहा है। UGC की शिकायत पर दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच ने यूनिवर्सिटी के खिलाफ चीटिंग और फर्जीवाड़े की दो FIR दर्ज कर दी हैं। वहीं, आतंकियों से जुड़े कई डॉक्टरों की गिरफ्तारी के बाद यूनिवर्सिटी की भूमिका पर और भी गंभीर सवाल उठ गए हैं। 10 नवंबर को दिल्ली लाल किले के पास ब्लास्ट के बाद यूनिवर्सिटी पर लगातार कार्रवाई हो रही है।
पूरे मामले में सबसे बड़ा खुलासा 9 नवंबर को हुआ, जब पुलिस ने अल-फलाह यूनिवर्सिटी से जुड़े डॉ. मुज़म्मिल शकील के किराए के ठिकानों से करीब 2,900 किलो IED बनाने वाला सामान बरामद किया। जांच में पता चला कि यह पूरी मॉड्यूल जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवत-उल-हिंद से प्रभावित था। उसी दौरान डॉ. शाहीन शाहिद की भी गिरफ्तारी हुई, जो यूनिवर्सिटी में काम करती थीं। पुलिस का आरोप है कि वह भारत में जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग तैयार करने की ज़िम्मेदारी संभाल रही थीं। उनकी कार से एक राइफल और लाइव कारतूस बरामद किए गए। डॉ. मुजम्मिल की गिरफ्तारी के अगले ही दिन इसी मॉड्यूल का हिस्सा रहे डॉ. उमर नबी ने लाल किले के पास ब्लास्ट कर दिया। इस विस्फोट में 13 लोगों की मौत और 21 लोग घायल हुए। अब दो और डॉक्टर और यूनिवर्सिटी परिसर की मस्जिद के एक मौलवी को भी हिरासत में लिया गया है।
जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, यूनिवर्सिटी की मुश्किलें कई गुना बढ़ गईं। AIU (Association of Indian Universities) पहले ही अल-फलाह की सदस्यता रद्द कर चुका है। अब ED (Enforcement Directorate) ने भी यूनिवर्सिटी के फाइनेंशियल लेनदेन की जांच शुरू कर दी है, खासकर उन कर्मचारियों और डॉक्टरों के ट्रांजैक्शन्स की, जिनके नाम आतंकी मॉड्यूल से जुड़े हैं।
गुरुवार को यूनिवर्सिटी को एक और बड़ा झटका लगा जब NAAC ने शो-कॉज नोटिस जारी किया। बताया गया कि यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर फर्जी 'ग्रेड ए' मान्यता दिखाना। NAAC ने साफ बताया कि वेबसाइट पर दिखाया गया ग्रेड ए गलत और भ्रामक था। यूनिवर्सिटी की दो संस्थाओं की मान्यता कई साल पहले ही समाप्त हो चुकी थी। जैसे ही नोटिस जारी हुआ अल-फलाह यूनिवर्सिटी ने अपनी वेबसाइट ही हटा दी।
दिल्ली पुलिस ने यूनिवर्सिटी को नोटिस भेजकर कई महत्वपूर्ण दस्तावेज मांगे हैं। इनमें फैकल्टी और स्टाफ की डिटेल्स, हॉस्टल और रेंटेड संपत्तियों का रिकॉर्ड, विदेशी फंडिंग से जुड़ी जानकारी, कर्मचारियों के बैकग्राउंड वेरीफिकेशन से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि यह पूरा मॉड्यूल सफेदपोश आतंकी नेटवर्क का हिस्सा था।
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