दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को हाईकोर्ट से झटका, ईडी की पूछताछ में नहीं रहेगा वकील

Published : Jun 04, 2022, 05:17 PM ISTUpdated : Jun 04, 2022, 05:29 PM IST
दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को हाईकोर्ट से झटका, ईडी की पूछताछ में नहीं रहेगा वकील

सार

ED की हिरासत में नौ जून तक भेजे गए दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। निचली अदालत द्वारा जैन से पूछताछ के दौरान एक वकील की मौजूदगी के आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट ने स्टे दे दिया है। अब पूछताछ में कोई वकील मौजूद नहीं रहेगा।  

नई दिल्ली। ईडी की हिरासत में दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को दिल्ली हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। सत्येंद्र जैन से ईडी के पूछताछ के दौरान एक वकील को साथ रहने की इजाजत को कोर्ट ने स्टे दे दी है। पूछताछ के दौरान जैन के अधिवक्ता को इतनी दूर रहने की इजाजत थी जहां से कार्यवाही देख सके लेकिन वह सुन न सके। सत्येंद्र जैन को ईडी ने मनी लॉन्ड्रिंग केस में अरेस्ट किया है। 

जस्टिस योगेश खन्ना ने कहा कि ऐसा आदेश तब दिया जाता है जब बयान की रिकॉर्डिंग के समय संभावित खतरे या जबरदस्ती की वास्तविक और जीवंत आशंका को इंगित करने के लिए विश्वसनीय सामग्री होता है। लेकिन वर्तमान मामले में कोई आशंका नहीं है। ऐसे दिशा-निर्देश को अधिकार के रूप में नहीं दिया जाना चाहिए था। दरअसल, जैन से ईडी के पूछताछ के दौरान एक वकील की मौजूदगी के लिए निचली अदालत ने आदेश जारी किया था। निचली अदालत के आदेश को ईडी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

31 मई को सत्येंद्र जैन को किया गया था गिरफ्तार

ईडी को बीते 30 मई को ईडी ने अरेस्ट किया था। मनी लॉन्ड्रिंग केस में गिरफ्तार सत्येंद्र जैन को स्पेशल कोर्ट ने नौ जून तक ईडी की हिरासत में भेज दिया था। ईडी की हिरासत में जैन को रिमांड पर लेते हुए निचली अदालत ने उनकी इस दलील को स्वीकार कर लिया था कि आरोपी से पूछताछ/जांच के दौरान आरोपी के एक वकील को सुरक्षित दूरी पर मौजूद रहने दिया जाए जहां वह आरोपी को देख सके लेकिन सुन न सके। ईडी ने हाईकोर्ट के आदेश को इस आधार पर चुनौती दी थी कि यह सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और कानून के विपरीत है।

जैन का प्रतिनिधित्व करने वाले वकीलों ने एजेंसी की याचिका का विरोध किया और कहा कि यह एक 'असाधारण मामला' है क्योंकि अभियोजन पक्ष ने याचिका दायर की है जबकि कानून उनके खिलाफ है। यह तर्क दिया गया था कि सुप्रीम कोर्ट ने लगातार एक ऐसी प्रणाली की अनुमति दी है जहां वकील कुछ दूरी पर उपलब्ध है लेकिन अभियोजन पक्ष उन्हें केवल आदेश बता रहा था।

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