मिल्खा सिंह नहीं रहे: शुरुआत में दौड़ते समय जूते तक खरीदने को पैसे नहीं थे, आर्मी में तीन बार रिजेक्ट हुए

Published : Jun 19, 2021, 08:00 AM ISTUpdated : Jun 19, 2021, 08:32 AM IST
मिल्खा सिंह नहीं रहे: शुरुआत में दौड़ते समय जूते तक खरीदने को पैसे नहीं थे, आर्मी में तीन बार रिजेक्ट हुए

सार

भारत के महान खिलाड़ी मिल्खा सिंह हमारे बीच नहीं रहे। 1959 में उन्हें पद्मश्री मिला था। फ्लाइंग किंग के नाम से विख्यात मिल्खा सिंह का 95 साल की उम्र में कोरोना से निधन हो गया। मिल्खा सिंह ने ऐसे समय में खेल की दुनिया में कदम रखा था, जब उसमें बहुत अधिक संभावनाएं नहीं थीं। 

नई दिल्ली. पूर्व भारतीय महान धावक 91 वर्षीय मिल्खा सिंह के निधन से खेलों में एक शून्य बन गया, जिसे भर पाना मुश्किल है। मिल्खा सिंह हमेशा चाहते थे कि इतनी बड़ी आबादी वाले देश में कोई दूसरा मिल्खा आए। लेकिन एक समय ऐसा था, जब खेल की दुनिया में कोई खास संभावनाएं नहीं होने से उन्हें काफी दिक्कतें उठानी पड़ीं। इसी वजह से वे मिल्खा सिंह नहीं चाहते थे कि उनका बेटा जीव मिल्खा सिंह धावक बने। 4 साल पहले मिल्खा सिंह ने यह बात छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कही थी। जानिए उनसे जुड़ीं कुछ अन्य बातें...

 कोरोना पॉजिटिव होने के बाद मिल्खा सिंह  को पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती किया गया था। पांच दिन पहले उनकी पत्नी का भी निधन हो गया था। रात 11.40 बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन के साथ भारतीय खेल के एक युग का अंत हो गया। इस दुखद सूचना से देश और दुनिया के खेल प्रेमियों में शोक की लहर फैल गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित तमाम नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया है।


बुढ़ापे में भी लोग दीवाने थे
मिल्खा सिंह का क्रेज हमेशा रहा। जब वे जवान थे, तब भी लोग उन पर जान छिड़कते थे और बुढ़ापे में भी लोग  उनके दीवाने थे। उन्होंने अपनी बायोपिक स्टोरी पर फिल्म बनाने सिर्फ एक रुपया लिया था।

नहीं मालूम था कि ओलंपिक गेम्स क्या होते है
जब मिल्खा सिंह ने खेल की दुनिया में कदम रखा, तब उन्हें नहीं मालूम था कि ओलंपिक किसे कहते हैं? एशियन गेम्स और 100 मीटर और 400 मीटर दौड़ क्या होती है? शुरुआत में वे नंगे पांव दौड़ते थे। लेकिन बाद में उन्होंने मिल्खा सिंह  ने 1956 और 1964 के ओलंपिक में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है। उन्हें 1959 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था।

चार बार जीता था गोल्ड
4 बार के एशियन गोल्‍ड मेडलिस्‍ट मिल्‍खा सिंह ने अपने करियर में कई खिताब जीते। मिल्‍खा सिंह ने 1956, 1960 और 1964 ओलिंपिक में भारत का प्रतिनिधित्‍व किया था। 1960 रोम ओलिंपिक का नाम आते ही मिल्‍खा सिंह की 400 मीटर की फाइनल रेस की यादें ताजा हो जाती हैं।

जीव को क्रिकेट बनाना चाहते थे मिल्खा सिंह
मिल्खा सिंह और उनकी पत्नी निर्मल कौर दोनों खिलाड़ी थे। निर्मल वॉलीबॉल टीम की कैप्टन थीं। वे अपने बेटे जीव को लाल अमरनाथ की तरह क्रिकेटर बनाना चाहते थे, लेकिन धावक नहीं। लेकिन एक बार स्कूल की तरफ से जीव ने जूनियर गोल्फ में नेशनल अवार्ड जीता। फिर लंदन और अमेरिका में टूर्नामेंट खेला। 4 बार यूरोप की चैम्पियनशिप जीती। इसके बाद मिल्खा सिंह संतुष्ट हुए। जब मिल्खा सिंह ने खेल की दुनिया में कदम रखा, तब आर्थिक तंगी थ। हालत यह थी कि जूते तक को पैसे नहीं थे। उन्हें तीन बार आर्मी से रिजेक्ट कर दिया गया। बता दें कि मिल्खा सिंह का जन्म 20 नवंबर, 1929 को पाकिस्तान में हुआ था। विभाजन के बाद वे भारत आ गए थे।

देशभर ने जताया शोक
मिल्खा सिंह के निधन पर देशभर में शोक की लहर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि देश ने एक महान खिलाड़ी खो दिया।

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मिल्खा सिंह की मौत पर दुःख जताते हुए कहा-वे हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे।

भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कहा-उनका व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ी को प्रेरणा देगा।

गृहमंत्री अमित शाह ने कहा- मिल्खा सिंह को देश हमेशा याद रखेगा।

यूपी के CM योगी ने मिल्खा सिंह के निधन पर दु:ख जताया है।
 

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