
From The India Gate: सियासी गलियारों में परदे के पीछे बहुत कुछ होता है- ओपिनियन, साजिश, सत्ता का खेल और राजनीतिक क्षेत्र में आंतरिक तकरार। एशियानेट न्यूज का व्यापक नेटवर्क जमीनी स्तर पर देश भर में राजनीति और नौकरशाही की नब्ज टटोलता है। अंदरखाने कई बार ऐसी चीजें निकलकर आती हैं, जो वाकई बेहद रोचक और मजेदार होती हैं। पेश है 'फ्रॉम द इंडिया गेट' (From The India Gate) का 20वां एपिसोड, जो आपके लिए लाया है, सत्ता के गलियारों से कुछ ऐसे ही मजेदार और रोचक किस्से।
जग में रह जाएंगे प्यारे तेरे बोल..
अपने फिल्मी अस्तित्व से अलग पूर्व सांसद और मलयालम फिल्मों के जाने-माने एक्टर, जिनका हाल ही में निधन हो गया हमेशा अपनी चप्पल के रंग के लंबे कुर्ते और धोती में दिखते थे। लोकसभा का सदस्य बनने के बाद भी हास्य उनका कवच था। 2014 के चुनाव में जब सीपीएम ने उन्हें चलक्कुडी से मैदान में उतारा, तो कई लोग हंसने लगे। किसी को उम्मीद नहीं थी कि कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखने वाला एक हास्य कलाकार चुनाव को इस कदर प्रभावित करेगा। अपनी जीत के बाद उन्होंने दिखाया कि कैसे जिंदगी को बेहद करीब से जानने वाला कोई शख्स एक अच्छा सांसद बन सकता है। अपने कैंसर के इलाज के बाद उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में डिटेक्शन सेंटर और केयर सेंटर स्थापित किए। जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने के लिए उन्होंने सभी राजनीतिक और धार्मिक सीमाओं को तोड़ दिया। उनका काम सबसे अलग और अद्वितीय था। उनके कार्यकाल को भ्रष्टाचार मुक्त युग के तौर पर याद किया जाएगा। सभी राजनीतिक दलों और नेताओं द्वारा उन्हें एक राजनीतिक पाठ के रूप में याद किया जाएगा। ऐसे नेता उंगलियों पर गिने जा सकते हैं, जिन्होंने आम जनता से जुड़ने के लिए सादगी को विचारधारा और मुस्कान को पासवर्ड की तरह इस्तेमाल किया हो।
समर्थन जुटाने के लिए मंच का इस्तेमाल..
महात्मा गांधी द्वारा शुरू किया गया और राष्ट्रीय नेताओं द्वारा आत्मसात किया गया वयक्कोम सत्याग्रह एक ऐसा आंदोलन रहा, जो मील का पत्थर साबित हुआ। पिछड़े वर्गों के अधिकारों को सुरक्षित करने और उन्हें शिव मंदिर के पास वाली सड़क का इस्तेमाल सुनिश्चित कराने के लिए गांधीजी कोट्टायम जिले के वयक्कोम में सत्याग्रह शुरू होने से पहले आए थे। हाल ही में वयक्कोम सत्याग्रह के 100 साल पूरे होने पर केरल और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों ने संयुक्त रूप से इस कार्यक्रम का उद्घाटन किया। वहीं, विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कांग्रेस घटक का शुभारंभ किया। पिछड़े वर्गों को उनके अधिकार दिलाने वाले आंदोलन की 100वीं वर्षगांठ के मौके पर कांग्रेस ने जिस तरह राहुल गांधी के लिए समर्थन जुटाने की खातिर मंच का इस्तेमाल किया, ये लोगों की समझ से परे है। वहीं, सीपीएम द्वारा वयक्कोम आंदोलन को कैप्चर करने की कोशिश भी कुछ अजीब ही लगी, क्योंकि जिस पार्टी का गठन ही सत्याग्रह के कम से कम 40 साल बाद हुआ हो, वो ऐसा दावा कैसे कर सकती है।
चुनावी मौसम और दलबदल..
देश भर में चुनावों का मुख्य आकर्षण टीवी पर होने वाली अलग-अलग पक्षों की बहस है। इन बहसों में चर्चा के विषय स्थानीय से लेकर राष्ट्रीय मुद्दों तक होते हैं। इन्हीं मुद्दों में अचानक तीखी बहस होती है, जो कहीं से भी निकल पड़ती है। रामनगर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ रहे पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बेटे निखिल को हाल के एक एपिसोड में प्रतिभागियों के 'दलबदल' के लिए याद रखा जाएगा। दरअसल, हाल ही में आयोजित एक 'हॉट चर्चा' में सैकड़ों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अलावा 70 बीजेपी कार्यकर्ताओं और 4 जेडीएस कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। आयोजकों ने कुछ देर तक इंतजार किया, लेकिन जेडीएस का कोई नया कार्यकर्ता चर्चा में शामिल होने नहीं आया। इस पर शो देखने आए 3 पत्रकारों को जेडीएस कार्यकर्ताओं के साथ शो में हिस्सा लेने के लिए कहा गया। बहस के कुछ ही मिनटों बाद, जेडीएस के एक नेता ने पार्टी सुप्रीमो एचडी कुमारस्वामी द्वारा निकाली जा रही पंचरत्न यात्रा का हवाला देते हुए दावा किया कि उनकी पार्टी को कांग्रेस और बीजेपी की तरह कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए लोगों को पैसे देने की जरूरत नहीं पड़ी। इससे चिढ़कर, कांग्रेस नेताओं ने जेडीएस कार्यकर्ताओं के भेष में आए तीनों पत्रकारों को जेडीएस का पक्ष को छोड़कर अपने पक्ष में आने का न्योता दिया। फिर कांग्रेस के एक नेता ने चुटकी लेते हुए कहा- जेडीएस के विधायक चुने जाने पर भी यही काम करते हैं। हालांकि, जेडीएस नेता ने शर्मिंदा होते हुए कबूल किया कि तीनों ही पत्रकार थे और उनके सहयोगी नहीं थे। वहीं, दूसरे जेडीएस नेता ने कहा- ये कुछ और नहीं बल्कि चुनावी मौसम में पत्रकारों का दलबदल है।
नेताजी के नखरे..
तेलंगाना दुनिया भर में अपने अचार के लिए जाना जाता है और यहां की राजनीति में भी वही तीखी चुभन छुपी हुई है। बीजेपी में हाल की घटनाओं ने राष्ट्रीय नेताओं के दिलों में कुछ ऐसी ही जलन पैदा की है। इसकी वजह बीजेपी में नए आए सीनियर लीडर और इनक्लूजन कमेटी के चेयरमैन एटेला राजेंद्र हैं। राजेंद्र ने बीजेपी में शामिल होने के लिए तत्कालीन टीआरएस (अब बीआरएस) से इस्तीफा दे दिया था। बाद में उन्होंने बीजेपी के टिकट पर हुजुराबाद निर्वाचन क्षेत्र से उपचुनाव जीता। हालांकि, राजेन्द्र ने बीजेपी द्वारा उनके समर्थकों को टिकट नहीं देने के साथ ही कुछ और वादे पूरे नहीं करने को लेकर समावेशन समिति के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देने की धमकी दी है। राजेन्द्र ने बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से पार्टी छोड़ने का अपना इरादा जाहिर किया है। हालांकि, नड्डा ने राजेंद्र को मनाने की कोशिश की और कहा कि सक्षम लोगों को टिकट दिया जाएगा, लेकिन वो अब भी नाखुश हैं। राजेंद्र की इस नाराजगी के चलते बीजेपी वाकई सियासी चाशनी में डूबी हुई नजर आ रही है। मुनुगोडे उपचुनाव में हार के साथ ही पार्टी ने अपना मोमेंटम खोना शुरू कर दिया है। राजेन्द्र के बाद कोई बड़ा नेता बीजेपी में शामिल नहीं हुआ है। साथ ही सीनियर लीडर्स की नाराजगी पार्टी के लिए सिरदर्द बन गई है। पार्टी में नाराजगी की एक वजह बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय की कार्यप्रणाली भी है। राजनीति को करीब से समझने वालों को लगता है कि इस मामले में दिल्ली जल्द ध्यान देगी।
अपना गिरेबां मैला और दूसरों को नसीहत..
राजनीति में एक दूसरे पर कीचड़ उछालना पार्टियों का पसंदीदा शगल है। लेकिन जब ममता बनर्जी वॉशिंग मशीन लेकर मोदी सरकार को गिराने की धमकी देते हुए परेड करें, तो ये किसी मजाक से कम नहीं। ममता बनर्जी एक तरफ जहां केंद्र पर मूल्य वृद्धि और विपक्षी दलों के दमन का आरोप लगा रही हैं, वहीं उनके अपने घरेलू मैदान पर कुछ इसी तरह के मुद्दों को लेकर तीखा विरोध चल रहा है। बीजेपी लीडर्स शुभेंदु अधिकारी और सुकांत मजुमदार ममता के खिलाफ उनकी मनमानी का विरोध करते हुए धरना दे रहे हैं। हालांकि, बंगाल जैसे राज्यों में वामपंथी पार्टियों पार्टियों की भारी दुर्दशा है। वाम दलों को दोतरफा रणनीति के तहत मोदी और ममता सरकार का विरोध करना है।
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