
नई दिल्ली। भारत की आजादी की लड़ाई में आजाद हिंद फौज (Indian National Army) के संघर्ष का अहम योगदान है। आजाद हिंद फौज का गठन जापान में रास बिहारी बोस ने किया था। बाद में उन्होंने इसकी कमान नेताजी सुभाष चंद्र बोस को सौंप दी थी। जनरल मोहन सिंह आईएनए के पहले जनरल थे। उन्होंने युद्ध के मौदान में आजाद हिंद फौज के जवानों का नेतृत्व किया था।
जनरल मोहन सिंह का जन्म पंजाब के सियालकोट में हुआ था। वह ब्रिटिश भारतीय सेना की 14वीं पंजाब रेजिमेंट में शामिल हो गए थे। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वह ब्रिटेन द्वारा मलाया भेजे गए जवानों में शामिल थे। जापान पर्ल हार्बर पर बमबारी करके दूसरे विश्व युद्ध में शामिल हो गया था। ब्रिटेन, सोवियत संघ और अमेरिका के नेतृत्व वाली सहयोगी सेनाओं के खिलाफ जापान जर्मनी का एशियाई सहयोगी था। जापान ने दक्षिण पूर्व एशिया में मित्र देशों की सेना को पीछे खदेड़ दिया था। जापान ने ब्रिटेन के हजारों सैनिकों को बंदी बनाया था। इनमें मोहन सिंह भी थे।
आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए थे मोहन सिंह
इसी दौरान आजाद हिंद फौज का गठन हुआ था। भारत की आजादी के लिए लड़ने वाली इस सेना के लिए सैनिकों की जरूरत थी। जापान के जेलों में बंद ऐसे सैनिकों को आजाद हिंद फौज में शामिल होने का ऑफर दिया गया जो पहले ब्रिटेन के लिए लड़ रहे थे। बड़ी संख्या में राष्ट्रवादी भारतीय सैनिक आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए। जापान के पूर्ण समर्थन से लगभग 40,000 भारतीयों को साथ लाकर आजाद हिंद फौज का गठन किया गया था।
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आजाद हिंद फौज के नेताओं में मोहन सिंह और प्रीतम ढिल्लों थे। कुछ समय बाद मोहन सिंह को जापानी इरादों पर शक हुआ और वे उनसे अलग हो गए। इसके बाद उन्हें जापान ने हिरासत में ले लिया था। नेताजी के टोक्यो पहुंचने और अधिकारियों के साथ चर्चा करने के बाद उन्हें रिहा किया गया था। दूसरे विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद ब्रिटेन ने आईएनए के सैनिकों को बंदी बना लिया था। भारत को स्वतंत्रता मिलने के साथ सभी सैनिकों को मुक्त कर दिया गया था। स्वतंत्रता मिलने के बाद मोहन सिंह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हो गए थे। वह राज्यसभा के लिए चुने गए थे। उन्होंने 1989 में 80 वर्ष की आयु में अंतिम सांस ली।
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