
अहमदाबाद. गुजरात हाईकोर्ट ने महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़ा एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने अपने 15 पन्नों के आदेश में सभी प्राइवेट और पब्लिक प्लेस पर मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं के सामाजिक बहिष्कार को रोकने का प्रस्ताव दिया है। मामले में आगे की सुनवाई 30 मार्च को होगी।
मासिक धर्म समाज में कलंक क्यों है?
कोर्ट ने कहा, मासिक धर्म हमारे समाज में कलंक है और यह कलंक मासिक धर्म से गुजर रही महिलाओं की अशुद्धता को लेकर चली आ रही पारंपरिक मान्यताओं और सामान्य रूप से इसपर चर्चा करने की हमारी अनिच्छा के कारण बना है।
महिलाओं को अशुद्ध क्यों कहा जाता है?
कोर्ट ने कहा कि आखिर क्यों सदियों से मासिक धर्म से गुजर रही महिलाओं को अशुद्ध कहा जाता है। जज जेबी पारदीवाला और इलेश वोरा की बेंच ने कहा, जानते हैं कि हम एक बहुत ही नाजुक मुद्दे से निपट रहे हैं और इसलिए इस कोर्ट के लिए सभी उत्तरदाताओं और अन्य स्टेकहोल्डर्स को सुनना जरूरी है।
किस केस पर सुनवाई हुई?
हाई कोर्ट ने कार्यकर्ता निर्झारी सिन्हा की दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। निर्झारी सिन्हा ने भुज शहर के कॉलेज में एक घटना के बाद याचिका दायर की थी, जिसमें 60 से अधिक छात्रों को उनके अंडरगारमेंट्स को निकालने के लिए कहा गया था, जिससे वे मासिक धर्म को साबित कर सकें। घटना पिछले साल 14 फरवरी की बताई गई थी।
मासिक धर्म से जुड़ा था विवाद
श्री सहजानंद गर्ल्स इंस्टीट्यूट (एसएसजीआई) द्वारा चलाए जा रहे एक हॉस्टल में 60 स्नातक लड़कियों को कथित तौर पर यह साबित करने के लिए मजबूर किया गया था कि उन्हें मासिक धर्म नहीं है।
वकील ने क्या-क्या तर्क दिए?
निर्झारी सिन्हा की ओर से पेश वकील मेघा जानी ने कहा कि हालांकि मासिक धर्म एक शारीरिक घटना है, जो हर महिला के साथ होती है। ये एक स्वाभाविक हिस्सा है। फिर भी यह हमेशा वर्जनाओं और मिथकों से जुड़ी जाती है।
वकील ने कहा कि मिथक इस धारणा पर आधारित हैं कि एक महिला अशुद्ध है और अपने मासिक धर्म के दौरान आसपास के वातावरण को प्रदूषित करेगी। वकील ने कहा, इसलिए लड़की या महिला को अलग रखा जाता है। दैनिक गतिविधियों से बाहर रखा जाता है। पानी छूने की अनुमति नहीं है। खाना पकाने की अनुमति नहीं है। उन्हें एक अलग जगह पर रखा जाता है और किसी भी धार्मिक समारोह या मंदिर में नहीं जाने दिया जाता है।
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