हाशिमपुरा कांड: इंसाफ़ में लगे 31 साल, दोषियों को 6 साल में ही मिली बेल

Published : Dec 06, 2024, 08:07 PM ISTUpdated : Dec 06, 2024, 08:11 PM IST
hashimpura

सार

हाशिमपुरा नरसंहार के दोषियों को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिलने से इंसाफ़ का इंतज़ार और लंबा होता दिख रहा है। 3 दशक बाद मिली सज़ा के बाद जमानत ने फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं।

Hashimpura massacre: यूपी के हाशिमपुरा नरसंहार का सच किसी डरावने सपने से कम नहीं। साल 1987 में हुए इस नरसंहार के दोषियों को न्याय के लिए तीन दशक तक इंतजार करना पड़ा था। न्याय की आस में कई इस दुनिया को अलविदा कह गए। हालांकि, न्याय तो मिला लेकिन दोषी ठहराए जाने छह साल बाद ही 10 आरोपी जमानत भी पा गए। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने हाशिमपुरा नरसंहार के 10 दोषियों को जमानत दे दी।

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस ओका और जस्टिस ऑगस्टीन जार्ज मसीह की बेंच ने सुनवाई करते हुए 10 दोषियों को बेल दे दी।

क्या है हाशिमपुरा नरसंहार कांड?

उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर में साल 1987 में बाबरी मस्जिद का विवाद चल रहा था। इसको लेकर सांप्रदायिक तनाव शुरू हो गया। स्थितियों को काबू में करने के लिए पीएसी और सेना का फ्लैगमार्च हाशिमपुरा में कराया गया। पीएसी व सेना ने सर्च ऑपरेशन चलाया। इस दौरान दंगाइयों ने दो राइफल लूट लिए, सेना के एक मेजर के रिश्तेदार की दंगा के दौरान हत्या हो गई। स्थिति पर काबू पाने के लिए पीएसी ने बड़ी कार्रवाई शुरू कर दी। पीएसी ने करीब 45 मुसलमानों को पकड़ा। पीएसी की एक टुकड़ी ने इन लोगों को एक ट्रक में भरा और थाने ले जाने की बात कही। लेकिन थाने के बजाय इनको एक नहर के पास ले जाया गया। पीएसी के जवानों ने ट्रकों से उतारकर गोलियों से भून डाला। इन शवों को गंग नहर और हिंडन नदी में फेंक दिया गया। इस नरसंहार में करीब 38 लोगों की हत्या हुई थी। हालांकि, केवल 11 शव ही मिले। पांच लोग सही-सलामत घर पहुंचे। बचे हुए लोगों के बयान के आधार पर मामला दर्ज हुआ। करीब तीन दशक तक यह केस चला।

31 साल लगे दोषियों को सजा दिलाने में...छह साल में जमानत

नरसंहार के 9 साल बाद गाजियाबाद कोर्ट में चार्जशीट दाखिल हुआ। मामले की जांच सीबी-सीआईडी ने की थी। मामले में ट्रायल धीमी गति से होने की वजह से सुप्रीम कोर्ट ने इसे दिल्ली कोर्ट को ट्रांसफर कर दिया। लेकिन ट्रॉयल कोर्ट ने 2006 में आरोप तय हुए लेकिन आरोपियों के बयान दर्ज होने में 8 साल लग गए। 2014 में आरोपियों के बयान दर्ज हुए। इस दौरान तीन आरोपियों की मौत हो चुकी थी। बयान होने के अगले साल कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए सबूतों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया। पीड़ित पक्ष ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने 31 अक्टूबर 2018 को ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलटते हुए सभी 16 आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई। इसके बाद सभी दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट ने याचिका दायर की। मामला अभी लंबित है। शुक्रवार को दोषियों की जमानत पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 10 दोषियों को जमानत दे दी।

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