
कभी छोटे-छोटे द्वीपों और दलदली इलाकों वाले ब्राजील के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में पुलिस को पहुँचाना एक चुनौती हुआ करता था। इस समस्या का समाधान उन्हें भैंसों में मिला। भैंस या बैल जैसे जानवरों से अनजान इस देश में आज 'बफेलो पुलिस' का एक अलग ही विभाग है। इतना ही नहीं, ब्राजील आज दुनिया का पाँचवां सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है। और यह मुकाम हासिल करने में ब्राजील की मदद की, भारत, खासकर गुजरात के भैंसों ने। यह कहानी थोड़ी पुरानी है।
1960 के दशक में ब्राजील के डेयरी उद्योग को मजबूत बनाने में भारत ने अहम भूमिका निभाई। गुजरात के भावनगर महाराजा द्वारा ब्राजील को भेंट की गई 'कृष्णा' नामक भैंस ने ब्राजील के डेयरी उद्योग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। आज ब्राजील का डेयरी उद्योग अरबों डॉलर का है। बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ब्राजील के मवेशी पालक सेल्सो गार्सिया सिड ने 1958 में अपने ब्राजीलियाई मवेशियों की नस्ल सुधारने के लिए एक खास किस्म के सांड की तलाश में अपने एक कर्मचारी, इल्डेफोन्सो डॉस सैंटोस को भारत भेजा था। यहीं से शुरू हुई 'कृष्णा' की कहानी, जिसने ब्राजील के मवेशी बाजार में एक क्रांति ला दी। इसके बाद, 'कृष्णा' की नस्ल 'गिर' की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसमान छूने लगी। आज यह नस्ल दुनिया के सबसे महंगे मवेशी भ्रूणों में से एक है।
ब्राजील में उत्पादित होने वाले 80% दूध का श्रेय 'कृष्णा' और उसकी पीढ़ी को जाता है। सिड के पोते, गिल्हेर्मे साचेती भी इस बात की पुष्टि करते हैं। 'कृष्णा' के उच्च गुणवत्ता वाले डीएनए की वजह से उसकी नस्ल को पूरे ब्राजील में प्रजनन के लिए इस्तेमाल किया गया। 'कृष्णा' की बढ़ती मांग को देखते हुए, इस नस्ल को वापस भारत लाने के प्रयास भी किए जा रहे हैं, जहाँ घटिया प्रजनन नीतियों के कारण यह लगभग विलुप्त हो चुकी है। वहीं, भारत से ब्राजील का सफ़र तय करने वाले पहले सांड 'कृष्णा' को आज भी सिड के फार्महाउस में एम्बॉम्ब करके रखा गया है। इस काँच के ताबूत पर लिखा है, “अगर आप 'गिर' को देखना चाहते हैं, तो मुझे देखो!”
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