
नई दिल्ली। दुनिया की सबसे ऊंचे लड़ाई के मैदान को आज ही के दिन 37 साल पहले भारतीय सेना ने विपरीत परिस्थितियों में बहादुरी दिखाते हुए जीता था। देश-दुनिया जिसे ‘आपरेशन मेघदूत’ के नाम से जानती है और यह सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन सबसे कठिन मैदान-सियाचिन ग्लेशियर पर किया गया। आज भारतीय सेना उस जीत का जश्न मना रही।
इसलिए आपरेशन मेघदूत को दिया अंजाम
कश्मीर का सियाचिन ग्लेशियर दुनिया का सबसे ऊंचा और सबसे कठिन लड़ाई का मैदान माना जाता है। भारत की उत्तरी सीमा के सियाचिन ग्लेशियर पर भारतीय सशस्त्र सेना ने वैशाखी के दिन अद्भुत शौर्य दिखाई थी। दरअसल, सियाचिन ग्लेशियर को पाकिस्तान धोखा से कब्जा करना चाहता था। कई बार पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को अपना मानकर इंडियान आर्मी को उधर पेट्रोलिंग से रोकने की भी कोशिश की थी। इसी कड़ी में 1982 में जब लेफ्टिनेंट जनरल मनोहर लाल छिब्बर नाॅदर्न कमांड के जनरल आफिसर कमांडिंग थे तो पाकिस्तान की ओर से एक प्रोटेस्ट नोट आया। इस पर भारत ने आपत्ति जताई लेकिन पाकिस्तान सियाचिन पर अपना दावा छोड़ने को राजी नहीं था।
21 अगस्त 1983 को पाकिस्तान के नाॅदर्न सेक्टर कमांडर ने इंडिया के कमांडर को एक नोट भेजा इसमें सियाचिन पर उसने दावा करते हुए उधर किसी प्रकार की पेट्रोलिंग या कैंप नहीं रखने की बात कही। साथ ही यह कहा गया कि एलओसी पर शांति केलिए भारत को सहयोग करना चाहिए। इस पर इंडिया ने आपत्ति जताते हुए सियाचिन पर किसी प्रकार की पाकिस्तानी गतिविधियों पर लगाम लगाने को कहा गया। लेकिन गुप्त सूचना मिली कि पाकिस्तान सियाचिन पर कब्जा की रणनीति बना रहा। इसके लिए पाकिस्तान ने विशेष सेना की टुकड़ी तैयार करनी शुरु कर दी है।
आपरेशन मेघदूत को मंजूरी
पाकिस्तान के बढ़ते नाफरमानी से भारत ने उसे सबक सिखाने की ठानी। भारतीय सेना को दुश्मन को सबक सीखाने के लिए सियाचिन पर हुकूमत करने के लिए तमाम इक्वीपमेंट चाहिए था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक बात पहुंचाई गई। उन्होंने तत्काल लेफ्टिनेंट जनरल पीएन हून को इक्वीपमेंट के लिए यूरोप भेजा।
पाकिस्तान ने पहले ही इक्वीपमेंट का आर्डर दे रखा था
जनरल हून जिस सप्लायर से मिले उसने पाकिस्तान से पहले ही 150 इक्वीपमेंट का आर्डर ले रखा था। फिर वह दूसरे सप्लायर से मिले, उसको आर्डर दिया।
लेकिन आर्डर का इंतजार खतरनाक था
हालांकि, पाकिस्तान की तैयारियां देख, सेना को यह लग गया कि आर्डर का इंतजार करने से देरी हो जाएगी। सेना में सियाचिन ग्लेशियर के लिए कर्नल Narendra Kumar के नेतृत्व में प्रशिक्षण चल रहा था। लद्दाख व कुमाउं रेजीमेंट के जवानों को इस अभियान के लिए तैयार किया जा रहा था। प्रशिक्षण पा रहे जवानों से पूछा गया कि क्या वह बिना सही कपड़ों व इक्वीपमेंट के इस अभियान में जा सकते हैं। देशभक्ति के जज्बे से भरे जवानों ने एकस्वर में हामी भरी।
वैशाखी के एक दिन पहले पहुंचे जनरल हून
12 अप्रैल 1984 को ले.जनरल पीएन हून इक्वीपमेंट भी लेकर पहुंच गए। शाम को सामान पहुंचते ही आपरेशन को हरी झंड़ी मिल गई। चार टीमें सियाचिन को कब्जे में लेने के लिए तैयार किया गया। अगले दिन बैशाखी थी। पाकिस्तान निश्चिंत था।
और फिर सियाचिन पर फहर गया तिरंगा
13 अप्रैल 1984 की अलसुबह हेलीकाॅप्टर्स से जवानों को पहुंचाया गया। 30 जवानों ने कैप्टन संयज कुलकर्णी के नेतृत्व में बिलाफोंड ला को आसानी से कब्जे में ले लिया। उसके बाद काफी बर्फबारी शुरू हो गई। लेकिन अगले दो दिन बाद सिया ला भारत के कब्जे में था। इसके बाद पाकिस्तान ने जून के महीना में आॅपरेशन अबाबील को चलाया। गोलियों और मोर्टार को दाग कर भारतीय जवानों को हटाना चाहा लेकिन मुंह की खानी पड़ी। अगस्त माह में ग्योंग ला पर भी भारतीय सेना ने तिरंगा फहरा दिया। इसके बाद पूरा सियाचिन भारत में सुरक्षित हो गया।
यह भारत के इतिहास का सबसे गोल्डेन चैप्टर
भारतीय सेना के रिटायर्ड ले.जनरल यश मोर याद करते हुए कहते हैं कि यह भारतीय इतिहास के गोल्डेन चैप्टर्स में से एक है। आॅपरेशन मेघदूत से भारत ने 37 साल पहले सिचाचिन ग्लेशियर को अपने कब्जे में लिया था। इसके बाद न जाने कितनी बार पाकिस्तान ने इस पर फिर से कब्जे की कोशिश की लेकिन हर बार नाकामी हाथ लगी। उन्होंने कहा कि सियाचिन ग्लेशियर क्षेत्र को सुरक्षित रखने में हमारे 11000 से अधिक सैनिक शहीद हो चुके हैं।
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