जम्मू-कश्मीर में दिखी सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिशाल, पर्वत की चोटी पर मूर्ति ले जाने में मुस्लिमों ने की मदद

Published : Aug 06, 2022, 04:33 PM IST
जम्मू-कश्मीर में दिखी सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिशाल, पर्वत की चोटी पर मूर्ति ले जाने में मुस्लिमों ने की मदद

सार

जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह में सांप्रदायिक सौहार्द्र की मिशाल दिखी है। 500-700 किलोग्राम वजनी मूर्तियों को पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर तक ले जाना था। सड़क नहीं होने से यह काम कठिन था। मुस्लिमों ने इस काम में हिन्दुओं की मदद की।  

भद्रवाह (जम्मू-कश्मीर)। जम्मू-कश्मीर के भद्रवाह में सांप्रदायिक सौहार्द्र की अनोखी मिशाल देखने को मिली। भद्रवाह-डोडा राजमार्ग से तीन किलोमीटर दूर पहाड़ी की चोटी पर स्थित कुर्सारी में हाल ही में पुनर्निर्मित शिव मंदिर में मूर्तियों को पहुंचाने में मुस्लिमों ने हिन्दुओं की मदद की।  

ग्रेनाइट पत्थर से बनी विशाल मूर्तियों को राजस्थान से लाया गया था। इनका वजन 500 किलोग्राम से 700 किलोग्राम के बीच था। मंदिर तक सड़क नहीं होने के चलते इन्हें ले जाना कठिन था। ऐसे में जम्मू-कश्मीर के डोडा के कुरसारी पंचायत के मुस्लिमों ने मदद की। 

चार दिन में बना दी सड़क
कठिनाई भांपते हुए कुरसारी पंचायत के सरपंच साजिद मीर मदद के लिए आगे आए। उन्होंने मंदिर तक सड़क निर्माण के लिए 4.6 लाख रुपए आवंटित किया। इसके साथ ही उन्होंने अपने समुदाय के 150 ग्रामीणों को कहा कि वे सड़क निर्माण और मूर्तियों को मंदिर तक ले जाने में मदद करें। दोनों समुदायों के स्वयंसेवकों ने चार दिन में सड़क बना दिया। इसके बाद मशीनों और रस्सियों के इस्तेमाल से मूर्तियों को मंदिर तक पहुंचाया गया। मूर्तियों को 9 अगस्त को एक धार्मिक समारोह के दौरान मंदिर में स्थापित किया जाएगा।

नहीं हुए नापाक मंसूबों के शिकार 
मीर ने कहा, "यह हमारी संस्कृति और विरासत में मिले मूल्य हैं। यही कारण है कि हम उन लोगों के नापाक मंसूबों के शिकार नहीं हुए जो हमें धर्म के आधार पर बांटने की कोशिश करते हैं। आज हमने फिर से दिखाया है कि हम एकजुट हैं।" 

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शिव मंदिर समिति ने भी मुस्लिमों के काम की प्रशंसा की। मंदिर समिति के अध्यक्ष रविंदर परदीप ने कहा, "पड़ोसियों का प्यार और स्नेह देखकर खुशी होती है। उन्होंने हमें ताकत दी। हमने मूर्तियों को मंदिर तक लाने में पिछले चार दिनों में कड़ी मेहनत की। यह एक समय असंभव काम लग रहा था।" 

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एक स्थानीय निवासी हाजी अब्दुल गनी मस्ताना (75) ने कहा, "मुझे यह देखकर बहुत खुशी हो रही है कि हमारे युवा सांप्रदायिक सद्भाव और आपसी भाईचारे के लोकाचार को खूबसूरती से आगे बढ़ा रहे हैं। यह दर्शाता है कि हमने सफलतापूर्वक मूल्यों को उनतक पहुंचाया है।"

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