Air Pollution: PM 10, PM 2.5 क्या हैं, इंसान की सेहत पर डालते हैं कैसा असर?

Published : Dec 02, 2024, 01:07 PM ISTUpdated : Dec 02, 2024, 01:08 PM IST
Delhi Air Pollution Photo

सार

राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस पर जानें, हवा में मौजूद PM 10 और PM 2.5 कण कितने खतरनाक हैं। दिल्ली समेत कई शहरों में बढ़ते प्रदूषण के बीच यह समझना जरूरी है।

नई दिल्ली। आज राष्ट्रीय प्रदूषण नियंत्रण दिवस (National Pollution Control Day) है। यह 1984 की दुखद भोपाल गैस त्रासदी में जान गंवाने वालों को श्रद्धांजलि देने के लिए 2 दिसंबर को मनाया जाता है। यह दिन स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रदूषण के विनाशकारी प्रभाव की याद दिलाता है।

वायु प्रदूषण की बात करें तो दिल्ली की हवा पिछले काफी दिनों से जहरीली बनी हुई है। इससे लोगों को सांस संबंधी बीमारियां हो रही हैं। वायु प्रदूषण की बात हो तो PM 10 और PM 2.5 क्या हैं और ये कैसे इंसान के स्वास्थ्य पर असर डालते हैं? इसे समझना अहम है।

पीएम 10 और पीएम 2.5 क्या हैं और ये कैसे हानिकारक हैं?

हवा में नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, कार्बन डाई ऑक्साइड और अन्य गैसों के साथ ही धूल के कण भी मौजूद होते हैं। धूल के कण अधिक बारीक होने पर इंसान के शरीर के लिए नुकसान दायक होते हैं। इन्हें PM (Particulate Matter) कहा जाता है। PM का आकार 10 माइक्रोन से अधिक हो तो ज्यादा खतरा नहीं होता, लेकिन अगर यह 10 माइक्रोन से छोटा है तो खतरनाक होता है। 2.5 माइक्रोन से छोटे PM ज्यादा घातक होते हैं।

यही वजह है कि हवा की गुणवत्ता की जांच में PM 10 और PM 2.5 कितना है इसपर खास नजर रखी जाती है। PM 10 और PM 2.5 जितना अधिक होगा हवा उतनी ज्यादा खराब होगी।

कितने छोटे होते हैं PM 10 कण?

PM 10 और PM 2.5 कण को देखने के लिए माइक्रोस्कोप की जरूरत होती है। PM 10 कण इतना छोटा होता है कि इसके बगल में रखा इंसान का बाल हाथी के दांत जैसा दिखता है। रेत का एक कण सोने की डली जैसा दिखता है। PM 2.5 कण PM 10 से कई गुणा छोटे होते हैं।

PM कण कहां से आते हैं?

PM कण के हवा में आने के कई स्रोत हैं। ज्यादातर कण तब बनते हैं जब वातावरण में रसायन प्रतिक्रिया करते हैं। निर्माण स्थल, कच्ची सड़कें, खेत, धुआं या आग से भी ये कण निकलते हैं और हवा में मिल जाते हैं।

कितने खतरनाक होते हैं PM 10 और PM 2.5 कण?

PM 10 और PM 2.5 कण इंसान के शरीर के लिए बहुत ज्यादा खतरनाक हैं। 10 माइक्रोमीटर से छोटे कण सबसे खतरनाक होते हैं। ये आपके फेफड़ों में गहराई तक जा सकते हैं। कुछ तो खून में मिल जाते हैं। हृदय या फेफड़ों की बीमारी वाले लोग, वृद्ध और बच्चों को इससे ज्यादा खतरा होता है।

लगातार अधिक प्रदूषण वाले वातावरण में रहने पर सांस संबंधी बीमारी होने का डर रहता है। हृदय या फेफड़ों की बीमारी वाले लोगों में समय से पहले मौत का डर रहता है। इसके चलते दिल का दौरा, अनियमित दिल की धड़कन, अस्थमा का बढ़ना, फेफड़ों की कार्यक्षमता में कमी, सीने में जलन, खांसी या सांस लेने में कठिनाई हो सकती है।

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