
नई दिल्ली: देश में कार्यस्थलों पर हर 10वीं महिला को किसी न किसी तरह से यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है और ऐसी शिकायतें करने वाली ज्यादातर महिलाओं के कार्यस्थल पर आंतरिक शिकायत समिति भी नहीं थी। राष्ट्रीय महिला आयोग और ‘दृष्टि स्त्री अध्ययन प्रबोधन केंद्र’ की ओर से जारी एक अध्ययन रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है। गत दो वर्षों के दौरान हुए अध्ययन में देश के 64 फीसदी जिलों में 74,095 महिलाओं से बात की गई। इस अध्ययन के तहत सरकारी पहचान पत्र एवं बैंकिंग सुविधा, शिक्षा, स्वास्थ्य रोजगार, नीति निर्धारण व्यवस्था और कई अन्य क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति के बारे में तथ्य एकत्र किए गए।
सैलरी को लेकर भी होता है भेद-भाव
इस अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है, ‘‘हर 10वीं महिला को अपने कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और ज्यादातर महिलाओं के कार्य स्थलों पर इसकी शिकायत दर्ज कराने के लिए कोई आंतरिक शिकायत समिति भी नहीं थी।’’ अध्ययन में भी यह पाया गया कि निजी क्षेत्र और असंगठित क्षेत्रों में महिलाओं को वेतन को लेकर भी भेदभाव का सामना करना पड़ा। बताया गया कि सिर्फ 69 फीसदी कार्यस्थलों पर शौचालयों जैसी बुनियादी सुविधाएं पाई गईं और सिर्फ 51 फीसदी महिलाओं ने जानकारी दी कि उन्हें नियमित तौर पर छुट्टियां मिलती हैं।
15% तक बढ़ा है साक्षरता दर
इस अध्ययन के मुताबिक देश 87 फीसदी कार्यस्थलों पर बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच की सुविधा नहीं है। यह एक बड़ी वजह है कि ज्यादातर महिलाओं को मां बनने के तत्काल बाद नौकरी से हटना पड़ा। इसमें यह भी पाया गया कि देश की 82 फीसदी महिलाओं के पास मतदाता पहचान पत्र, 79 फीसदी के पास बैंक खाते और 64 फीसदी महिलाओं के पास पैन कार्ड है। 2011 की जनगणना के बाद महिलाओं की साक्षरता में 15 फीसदी बढ़ोतरी भी हुई।
इस अध्ययन के अनुसार महिलाओं में रक्तचाप के बाद गठिया रोग सबसे आम बीमारी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि महिलाएं पुरुषों के मुकाबले आमतौर पर ज्यादा खुश रहती हैं तथा इस खुशी का आय से कोई लेनादेना नहीं है।
(यह खबर समाचार एजेंसी भाषा की है, एशियानेट हिंदी टीम ने सिर्फ हेडलाइन में बदलाव किया है।)
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