पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को उस दिन नहीं पता था कि वो जनता को नहीं मौत को बुला रहे हैं...

Published : Aug 20, 2019, 08:43 AM ISTUpdated : Aug 20, 2019, 05:36 PM IST
पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को उस दिन नहीं पता था कि वो जनता को नहीं मौत को बुला रहे हैं...

सार

राजीव गांधी की 75वीं जयंती है। वे देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे। उन्होंने मां की हत्या के बाद 40 साल की उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। 

नई दिल्ली. राजीव गांधी की 75वीं जयंती है। वे देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे। उन्होंने मां और देश की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 40 साल की उम्र में प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेंरबदूर में हुए एक आत्मघाती धमाके में राजीव की हत्या कर दी गई थी।  राजीव गांधी की हत्या की साजिश भारत नहीं बल्कि बाहर पड़ोसी मुल्क में रची गई थी। जानें किस तरह उनकी हत्या की साजिश को अंजाम दिया गया था। 

पड़ोसी देश श्रीलंका में रची गई थी साजिश...
नवंबर, 1990 में जाफना (श्रीलंका) में लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन और उसके चार साथियों बेबी सुब्रह्मण्यम, मुथुराजा, मुरूगन और शिवरासन ने यह साजिश रची थी। जंगल में घंटों चली गोपनीय बैठक के बाद आखिर प्रभाकरन ने राजीव गांधी की मौत के प्लान पर मुहर लगा दी। प्लान को पूरा करने की जिम्मेदारी चार लोगों को सौंपी गई थी। 

इन्हें सौंपी गई थी कमान
बेबी सुब्रमण्यम : लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) विचारक, हमलावरों के लिए रहने की जुगाड़ की जिम्मेदारी सौंपी थी। मुथुराजा : प्रभाकरन का खास आदमी, हमलावरों के लिए कम्युनिकेशन और पैसों का इंतजाम करने को कहा गया। वहीं मुरुगन जो कि विस्फोट करने में माहिर था, ने हमले के लिए जरूरी चीजों का इंतजाम किया। शिवरासन को जासूसी की जिम्मेदारी  सौंपी गई।

 

बड़ी सख्ती से दिया था साजिश को अंजाम

राजीव गांधी की हत्या की साजिश को पूरी सख्ती से अंजाम दिया गया। सबसे पहले प्रभाकरन से राजीव गांधी की हत्या का फरमान मिलने के बाद बेबी सुब्रह्मण्यम और मुथुराजा 1991 की शुरुआत में चेन्नई आए। बेबी और मुथुराज को चेन्नई में ऐसे लोग ढूंढने थे, जो राजीव के हत्यारों के लिए हत्या से पहले रुकने के लिए घर दें और हत्या के बाद छिपने की जगह। बेबी सुब्रह्मण्यम और मुथुराजा चेन्नई में सबसे पहले शुभा न्यूज फोटो एजेंसी पहुंचे। एजेंसी का मालिक शुभा सुब्रह्मण्यम ईलम सपोर्टर था। शुभा को साजिश के लिए लोकल सपोर्ट देना था। बेबी सुब्रह्मण्यम ने सबसे पहले शुभा न्यूज फोटो एजेंसी में काम करने वाले भाग्यनाथन को अपनी ओर किया।

राजीव हत्याकांड में सजा भुगत रही नलिनी इसी भाग्यनाथन की बहन है, जो उस वक्त एक प्रिंटिंग प्रेस में काम करती थी। नलिनी की मां नर्स थी और उन्हें अस्पताल की ओर से मिला घर खाली करना था। मुश्किल हालात में घिरे भाग्यनाथन और नलिनी को आतंकी बेबी ने पैसे और मदद के झांसे में ले लिया। शुभा न्यूज एजेंसी में रविशंकरन और हरिबाबू बतौर फोटोग्राफर काम करते थे। हरिबाबू को नौकरी से निकाल दिया गया था। ऐसे में मुथुराजा ने हरिबाबू को दूसरी जगह नौकरी दिलाने में मदद की। यहां हरिबाबू को अच्छा पैसा मिलने लगा और वह मुथुराजा का मुरीद हो गया। मुथुराजा ने हरिबाबू को राजीव गांधी के खिलाफ भड़काने का काम शुरू कर दिया और कहा कि अगर वो 1991 के चुनाव में जीत गए तमिलों की हालत बेहद खराब होगी।

दो महिलाओं को बनाया मानवबम

इसके बाद मुरुगन के इशारे पर दो और लोग जयकुमारन और पायस साजिश में शामिल हो गए और ये  नलिनि-भाग्यनाथन-बेबी-मुथुराजा के ठिकाने पर पहुंचे। नलिनि जिस प्रिटिंग प्रेस में नौकरी करती थी, वहां छप रही किताब सैटनिक फोर्सेस ने उसका ब्रेनवॉश कर दिया। नलिनी पूरी तरह राजीव गांधी के खिलाफ हो गई थी। अब मुरुगन ने हत्यारों की नकली पहचान तैयार करने के लिए जयकुमारन और पायस की मदद से फर्जी ड्राइविंग लाइसेंस बनवाए। अब साजिश के चौथे सूत्रधार शिवरासन को संदेशा भेजा गया और मार्च, 1990 की शुरुआत में वो समुद्र के रास्ते चेन्नई पहुंचा। यहां वो पोरूर इलाके में पायस के घर रुका। पोरूर राजीव की हत्या की साजिश का मुख्य अड्डा था।

अब शिवरासन ने कमान अपने हाथ में ले ली और चेन्नई में नलिनी, मुरूगन और भाग्यनाथन के साथ मानवबम की तलाश की। जब मानवबम नहीं मिला तो वह वापस जाफना गया और प्रभाकरन को बात बताई। इस पर प्रभाकरन ने शिवरासन की चचेरी बहनों धनू और शुभा को उसके साथ भारत भेजा। धनू और शुभा को शिवरासन नलिनी के घर ले गया। इसके बाद उसने बम एक्सपर्ट अरिवू से एक ऐसा बम बनाने को कहा, जो महिला की कमर में बांधा जा सके। अरिवू ने एक ऐसी बेल्ट बनाई, जिसमें छह आरडीएक्स भरे ग्रेनेड जमाए जा सकें। हर ग्रेनेड में अस्सी ग्राम C4 आरडीएक्स भरा गया। बम को ऐसे डिजाइन किया गया था कि आरडीएक्स भले चाहे कम हो लेकिन जब धमाका हो तो टारगेट बच न सके। 

जब प्लान कामयाब होते नजर आया
अब शिवरासन के पास बम भी था और इसे अंजाम देने वाली मानवबम धनू भी। इतंजार था तो बस राजीव गांधी की रैली का। 12 मई 1991 को शिवरासन और धनू ने पूर्व पीएम वीपी सिंह और डीएमके सुप्रीमो करुणानिधि की रैली में फाइनल रेकी की। अरक्कोनम में हुई इस रैली में धनू वीपी सिंह के बेहद करीब पहुंची और उनके पैर भी छुए। बस बम का बटन नहीं दबाया। अब शिवरासन के इरादे बुलंद हो गए और उसे प्लान कामयाब होता नजर आया। 

माला पहनाई, पैर छुआ और सबकुछ खत्म...
राजीव गांधी की चुनावी मीटिंग 21 मई को श्रीपेरंबदूर में तय थी। शिवरासन ने तय कर लिया कि 21 को ही साजिश को अंजाम देना होगा। नलिनी के घर 20 मई की रात शुभा ने धनू को बेल्ट पहनाकर प्रैक्टिस करवाई। सुबह पांच लोग शिवरासन, धनू, शुभा, नलिनी और हरिबाबू साजिश को अंजमा देने के लिए तैयार थे। श्रीपेरंबदूर की रैली में राजीव गांधी के पहुंचने के बाद एक महिला सब इंस्पेक्टर ने धनू को दूर रहने को कहा पर राजीव गांधी उसे रोकते हुए बोले कि सबको पास आने का मौका मिलना चाहिए। राजीव को नहीं पता था कि वो जनता को नहीं मौत को पास बुला रहे हैं। इसके बाद उस महिला ने उन्हें जैसे ही माला पहनाई और पैर छूने के लिए झुकी तो तेज धमाका हुआ और सबकुछ खत्म हो गया।  


 

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