
नई दिल्ली. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सांसद मनोज झा ने हाल ही में देश में लागू हुए कृषि कानूनों के खिलाफ सु्प्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है। केंद्र सरकार द्वारा संसद से पारित कराए गए कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए झा ने उच्चतम न्यायालय का रूख किया है । उन्होंने इन कानूनों को भेदभावपूर्ण और मनमाना बताते हुए कहा है कि इन कानूनों के लागू होने से बड़े पूंजीपति छोटे किसानों का शोषण करेंगे । संसद ने हाल में तीन विधेयकों- ‘कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विधेयक-2020’, ‘किसान (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन’ अनुबंध एवं कृषि सेवाएं विधेयक 2020 और ‘आवश्यक वस्तु संशोधन विधेयक-2020 को पारित किया था। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की मंजूरी मिलने के बाद ये तीनों कानून 27 सितंबर 2020 से प्रभावी हो गए हैं।
झा के अलावा दो सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया
राजद के राज्यसभा सदस्य मनोज झा ने वकील फौजिया शकील के जरिए शीर्ष अदालत में याचिका दायर कर दी है। झा के अलावा, केरल से कांग्रेस के लोकसभा सदस्य टी एन प्रथपन और तमिलनाडु से द्रमुक के राज्यसभा सांसद तिरुचि शिवा ने भी कृषि कानूनों के खिलाफ सु्प्रीम कोर्ट का रूख किया है । झा ने अपनी याचिका में कहा है कि इन कानूनों ने कृषि क्षेत्र को बड़े कारोबारियों और पूंजीपतियों के हाथों में सौंपने का रास्ता तैयार कर दिया है जिससे कोई नियमन नहीं रहेगा और किसानों के लिए शोषणकारी व्यवस्था तैयार हो जाएगी ।
संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है कृषि कानून
झा ने अपनी याचिका में कहा है कि किसान को निजी कंपनी के साथ बेहतर समझौता करने की जानकारी नहीं होती । इससे गैरबराबरी की व्यवस्था शुरू होगी और कृषि क्षेत्र पर कारोबारी घरानों का एकाधिकार हो जाएगा। याचिका में कहा गया है कि संसदीय नियमों और परिपाटी का उल्लंघन कर संसद में विधेयकों को पारित किया गया। ये कानून इस आधार पर असंवैधानिक हैं कि इससे भेदभाव होता है और यह मनमाना है और संविधान के मूल ढांचे के खिलाफ है ।
एमएसपी सुनिश्चित नहीं किया- झा
याचिका में कहा गया है कि ये कृषि कानून गरीब किसानों के जीवन के आधार भारतीय कृषि क्षेत्र को पूंजीपतियों के हाथों में देने को बढ़ावा देते हैं । राजद नेता ने याचिका में कहा है कि इनमें किसानों के हितों की बलि दे दी गयी है और विवाद की स्थिति में समाधान के लिए किसी तरह के तंत्र की व्यवस्था नहीं की गई है । उन्होंने कहा कि यह ध्यान देने वाली बात है कि इन कानूनों के जरिए किसानों को बड़े पूंजीपतियों के विरूद्ध खड़ा किया गया है जिनके पास मोलभाव की अपार शक्ति है । याचिका में कहा गया है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सुनिश्चित करने के बजाए कृषि क्षेत्र को निजी क्षेत्रों के हवाले कर दिया गया ।
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