
Katchatheevu Island issue: देश में लोकसभा चुनाव के दौरान कच्चाथीवू द्वीप को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर ने पूर्व की इंदिरा गांधी सरकार पर हमला बोलते हुए एक नया बहस छेड़ दिया है। हालांकि, देश में छिड़े इस बहस को लेकर श्रीलंका बेहद निश्चिंत है। एक श्रीलंकाई अधिकारी ने एशियानेट से बातचीत में कहा कि श्रीलंकाई पक्ष के लिए यह मुद्दा एक सुलझा हुआ पहले का मसला है। कई दशक पहले दोनों देशों के बुद्धिमान लोगों ने इस मुद्दे को हल किया था। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर 1974 में एमओयू पर साइन किया गया था। ऐसे में इस पर बहस करना कोलंबो का मामला नहीं है। यह भारत का चुनावी मामला है।
मुद्दे को उठाना नई दिल्ली का मामला, न कि कोलंबो का
श्रीलंका सरकार के सीनियर ऑफिसर ने कहा कि दशकों के अंतराल के बाद कच्चाथीवू मुद्दे को उठाना 'नई दिल्ली का मामला' है, न कि कोलंबो का। अधिकारी ने एशियानेट को बताया कि ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर 1974 में समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। उन्होंने कहा कि कच्चाथीवू द्वीप जाफना साम्राज्य का हिस्सा था और दोनों देशों के 'बुद्धिमान व्यक्तियों' ने 1970 के दशक में समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। अधिकारी ने यह भी बताया कि इस समय टिप्पणी करना अनुचित होगा क्योंकि दोनों देशों में चुनाव नजदीक हैं।
क्या है कच्चाथीवू द्वीप का मसला?
बीते 31 मार्च को पीएम नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस पर बड़ा आरोप लगाया। पीएम ने कच्चाथीवू द्वीप को लेकर कांग्रेस पर हमला बोलते हुए पूर्व पीएम इंदिरा गांधी को द्वीप को श्रीलंका को सौंपने का आरोप लगाया। दरअसल, पाक जलडमरूमध्य से एडम ब्रिज तक के ऐतिहासिक जल क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सीमा का सीमांकन करने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।
प्रधानमंत्री के हमले के बाद पहली अप्रैल को जयशंकर ने राष्ट्रीय राजधानी में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार ने उस क्षेत्र में भारतीय मछुआरों के अधिकार छीन लिए हैं और इसके लिए जिम्मेदारी लेने से इनकार कर रही है।
इस आरोप के बाद बीजेपी ने तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके को कटघरे में खड़ा कर दिया है। बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के.अन्नामलाई ने आरटीआई से यह खुलासा किया था कि इंदिरा गांधी ने कच्चाथीवू द्वीप को श्रीलंका को सौंपा था।
कच्चाथीवू द्वीप का इतिहास?
कच्चाथीवू द्वीप 285 एकड़ का निर्जन अपतटीय द्वीप है। यह भारत और श्रीलंका में रामेश्वरम के बीच पाक जलडमरूमध्य में भारतीय तट से 33 किमी दूर स्थित है। यह द्वीप 14वीं शताब्दी में ज्वालामुखी विस्फोट के बाद अस्तित्व में आया। प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में इस द्वीप पर श्रीलंका के जाफना साम्राज्य का नियंत्रण था।
17वीं शताब्दी के बाद से रामनाथपुरम से लगभग 55 किमी उत्तर-पश्चिम में स्थित रामनाद साम्राज्य इस द्वीप को नियंत्रित करता था। ब्रिटिश शासन के दौरान, दोनों देशों ने 1974 में इसका निपटारा होने तक इस क्षेत्र पर अपना दावा किया। 1976 तक भारतीय मछुआरों को मछली पकड़ने का अधिकार प्राप्त था लेकिन उसके बाद, कच्चाथीवू द्वीप में यह अधिकार देने से इनकार कर दिया गया। हालांकि, 1970 के दशक के दौरान इसका सामरिक महत्व बहुत कम था लेकिन पिछले दो दशकों में, श्रीलंकाई जलक्षेत्र में चीन के आक्रामक प्रभाव के कारण भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारी बदलाव आया है। अब यह द्वीप भारत के लिए सामरिक महत्व का क्षेत्र बन गया है।
यह भी पढ़ें:
National News (नेशनल न्यूज़) - Get latest India News (राष्ट्रीय समाचार) and breaking Hindi News headlines from India on Asianet News Hindi.