
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियानों के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासियों की गैर-न्यायिक हत्या की घटनाओं की स्वतंत्र जांच कराने की मांग संबंधी याचिका को खारिज कर दिया है। इस याचिका को 2009 में दायर किया गया था। कोर्ट के इस फैसले से सुरक्षा बलों को बड़ी राहत मिली है।
जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने यह फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार पर पांच लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया है। अदालत ने 2009 में छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ के खिलाफ किए गए अतिरिक्त न्यायिक हत्याओं के आरोपों को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ राज्य सबूतों को नष्ट करने, झूठे बयानों, आपराधिक साजिश या किसी अन्य अपराध के लिए संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है।
जवानों पर लगाया था हत्या और रेप का आरोप
हिमांशु कुमार द्वारा दायर जनहित याचिका 2009 में दंतेवाड़ा जिले में तीन अलग-अलग घटनाओं में 17 ग्रामीणों की मौत पर उनके द्वारा दर्ज की गई गवाही पर आधारित थी। हिमांशु ने कोर्ट को बताया था कि सितंबर 2009 से अक्टूबर 2009 के बीच सुरक्षा बल के जवानों ने छत्तीसगढ़ में न केवल आदिवासियों की हत्याएं की, बल्कि बलात्कार और लूट भी किया।
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सुप्रीम कोर्ट गई थी केंद्र सरकार
कुमार ने यह भी दावा किया कि मृतक के परिवार के सदस्यों और अन्य प्रत्यक्षदर्शियों ने सुरक्षा बलों को आदिवासियों पर संगीनों से हमला करते, उन्हें करीब से गोली मारते और शवों को क्षत-विक्षत करते देखा था। इस साल अप्रैल में केंद्र ने भी 2009 में हिमांशु द्वारा दायर जनहित याचिका के लिए कार्यकर्ता और छत्तीसगढ़ के 12 आदिवासियों के खिलाफ झूठी गवाही देने की कार्यवाही शुरू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। केंद्र सरकार ने कहा था कि वे वामपंथी उग्रवादियों को कानूनी सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश कर रहे थे।
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