
Judges salary crisis: लोकतंत्र की मजबूती के लिए विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का संतुलन बेहद जरूरी माना जाता है। लेकिन सरकार बनाने के चक्कर में राजनैतिक दल संतुलन बिगाड़ रहे हैं। आलम यह कि न्यायपालिका को चलाने वाले जजों की सैलरी का संकट हो जा रहा है। सरकारें, जजों को सैलरी देने में कोताही कर रही हैं। मंगलवार को ऐसे ही मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को फटकारा और कहा कि मुफ्त की रेवड़ियां बांटने के लिए पैसे हैं लेकिन जजों की सैलरी-पेंशन के लिए नहीं।
जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने महाराष्ट्र और दिल्ली चुनाव में की गई घोषणाओं का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव आता है तो लाड़ली बहना जैसी योजनाएं लागू करने की बात होती है। दिल्ली में कोई 2100 रुपये तो कोई 2500 रुपये देने की बात कर रहा है। लेकिन जब जजों की सैलरी की बात आती है तो वित्तीय संकट का बहाना बनाने लगते हैं।
केंद्र सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए अटॉर्नी जनरल वेंकटरमणी ने कहा कि सरकार ने नई पेंशन स्कीम में वित्तीय दबाव को ध्यान में रखा है। अटॉर्नी जनरल ने सुनवाई को स्थगित करने की मांग की लेकिन बेंच ने खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला कई सालों से लंबित है। सरकार अगर कोई नोटिफिकेशन जारी करती है तो वह कोर्ट को सूचित करेगी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनवाई ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन की ओर से दायर की गई याचिका पर की है। याचिका 2015 में दायर की गई थी। याचिका जजों की पेंशन और वेतन में सुधार की मांग को लेकर थी। कोर्ट बुधवार को भी सुनवाई जारी रखेगा।
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